एस्टेरॉयड के टकराने से विलुप्त हो गये थे डायनासोर
धरती गर्म तो अंटार्कटिका तक चले गये
तापमान गिरा तो उष्षकटिवंधीय इलाका
भविष्य के लिए भी यह एक संकेत है
राष्ट्रीय खबर
रांचीः 66 मिलियन वर्ष पहले जिस एस्टेरॉयड के हमले ने डायनासोरों का नामोनिशान मिटा दिया था, उसमें मगरमच्छ कैसे बच गए? नए अध्ययन से पता चलता है कि गर्म वातावरण के प्रति उनकी पसंद ने पृथ्वी के इस सबसे बड़े महाविनाश के दौरान उन्हें एक महत्वपूर्ण बढ़त दी होगी। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में शोध में पाया गया कि मगरमच्छों और उनके प्राचीन पूर्वजों ने अपने 25 करोड़ वर्षों के विकासवादी इतिहास का अधिकांश समय तापमान में आए नाटकीय बदलावों के अनुकूल ढलने के बजाय गर्म जलवायु का पीछा करते हुए बिताया। जब पृथ्वी अधिक गर्म हुई, तो वे नए क्षेत्रों में फैल गए और कभी-कभी अंटार्कटिका तक पहुँच गए। तापमान गिरते ही वे वापस उष्णकटिबंधीय (ट्रॉपिक्स) क्षेत्रों की ओर लौट आए।
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‘साइंस एडवांसेस’ में प्रकाशित इस अध्ययन में 400 से अधिक जीवित और विलुप्त प्रजातियों के 7,000 से अधिक जीवाश्मों और रिकॉर्ड्स का विश्लेषण किया गया। परिणामों से संकेत मिलता है कि एस्टेरॉयड के टकराने के बाद भी उष्णकटिबंधीय और उप-उष्णकटिबंधीय क्षेत्र मगरमच्छों के रहने योग्य बने रहे, जबकि डायनासोरों के अनुकूल वातावरण तेजी से नष्ट हो गया। केवल सबसे चरम जलवायु सिमुलेशन में ही मगरमच्छों के ये आश्रय स्थल समाप्त हुए।
यूसीएल अर्थ साइंसेज के मुख्य लेखक डॉ. एल्फियो एलेसेंड्रो चियारेन्जा ने कहा, एस्टेरॉयड ने पूरी पृथ्वी को सभी जीवों के लिए एक समान रूप से प्रतिकूल नहीं बनाया था। गर्म वातावरण के प्रति मगरमच्छों की पुरानी पसंद ने उन्हें ठीक वहीं रखा जहाँ उपयुक्त जलवायु सबसे अच्छी तरह बनी रही, जैसे कि भूमध्य रेखा (इक्वेटर) के आसपास। इन आश्रयों ने उन आबादी को सुरक्षित रखा जो बाद में फिर से उबर पाईं।
प्राचीन मगरमच्छ विविधता से भरे थे। सार्कोसुचस (सुपर क्रोक) जैसे विशाल शिकारी 12 मीटर लंबे हो सकते थे, जो टी-रेक्स को भी खा सकते थे, जबकि कुछ छोटे जीव पग कुत्ते के चेहरे जैसे दिखते थे। इस विविधता के बावजूद, जलवायु के साथ उनका संबंध हमेशा एक समान रहा।
लगभग 6.6 करोड़ वर्ष पहले चिक्सुलुब एस्टेरॉयड के टकराने के बाद जब धूल और राख के कारण सूर्य का प्रकाश 5 से 10 फीसद तक कम हो गया, तब भी भूमध्य रेखा के पास के गर्म क्षेत्र मगरमच्छों के अनुकूल रहे। वैज्ञानिकों के अनुसार, केवल तापमान ही नहीं बल्कि उनका छोटा शरीर, पानी और ज़मीन दोनों पर रहने की क्षमता, खान-पान में लचीलापन और उनका कोल्ड-ब्लडेड (समतापी) होना भी उनके बचने के अन्य कारण रहे, जिससे उन्हें बहुत कम भोजन की आवश्यकता होती थी। यह अध्ययन चेतावनी देता है कि लाखों वर्षों से जलवायु परिवर्तन से बचने के लिए मगरमच्छ नए क्षेत्रों में जाते रहे हैं, लेकिन आज बढ़ते शहरों, सड़कों और खेतों के कारण उनके पास भागने के रास्ते सीमित हो गए हैं।
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