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पीलीभीत फर्जी मतदाता कांड पूरे देश में संभव

रिपोर्टस कलेक्टिव ने साफ्टवेयर के सेंधमारी की जांच की

ईआरओ के नाम पर यह खेल संभव है

पूरे देश में फर्जी वोटर शामिल हुए क्या

तय नियमों का भी पालन नहीं किया गया

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र में विशेष गहन संशोधन प्रक्रिया समाप्त होने के बाद हजारों असली मतदाताओं के नाम हटा दिए गए और उनकी जगह फर्जी पहचान दर्ज कर दी गई। यदि विपक्षी दलों द्वारा इस धोखाधड़ी को पकड़ा न गया होता, तो ये फर्जी मतदाता आगामी चुनावों में मतदान कर सकते थे। 22 अक्टूबर को राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने इस गड़बड़ी को स्वीकार करते हुए माना कि मतदाता सूची में बदलाव के लिए कोई औपचारिक आवेदन जमा किए बिना ही नाम हटाए गए थे। नियमतः ऐसे बदलावों के लिए आवेदन अनिवार्य हैं ताकि हर संशोधन का लिखित प्रमाण और रिकॉर्ड मौजूद रहे।

रिपोर्ट्स कलेक्टिव के पत्रकारों द्वारा पीलीभीत के केवल 55 बूथों की स्वतंत्र जांच में 2,691 फर्जी मतदाताओं के नाम जोड़े जाने की पुष्टि हुई। यूपी के मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा गड़बड़ी स्वीकार करने के आठ दिन बाद जब दोबारा जांच की गई, तो पाया गया कि इनमें से 2,638 फर्जी मतदाता अब भी मतदाता सूची में बने हुए थे।

जांच में तीन ऐसी गंभीर प्रणालीगत कमियों का खुलासा हुआ है, जिन्होंने पीलीभीत में इस फर्जीवाड़े को अंजाम देने में मदद की। चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर और प्रक्रियाओं में मौजूद ये कमियां केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये पूरे देश में एसआईआर के बाद तैयार होने वाली मतदाता सूची की निष्पक्षता को प्रभावित करती हैं।

यह धोखाधड़ी मतदाता सूची के सामान्य वार्षिक अद्यतन के दौरान हुई। इस प्रक्रिया के तहत निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों को सूची में संशोधन करने के व्यापक विवेकाधिकार दिए गए हैं। अधिकारी बिना किसी दस्तावेजी सबूत के या मतदाता को सूचित किए बिना डेटा बदल सकते हैं और बिना जमीनी सत्यापन के इसे मंजूरी भी दे सकते हैं।इसके अलावा, चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ईसीआईनेट में अधिकारियों द्वारा किए गए बदलावों का स्थायी रिकॉर्ड रखना या उसे सार्वजनिक करना अनिवार्य नहीं है। पत्रकारों द्वारा चुनाव आयोग के दिल्ली मुख्यालय और यूपी के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को भेजे गए विस्तृत सवालों का कोई जवाब नहीं मिला।

10 अप्रैल को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद पीलीभीत में संशोधन किए गए। मतदाता पहचान पत्र नंबर वही रहा, लेकिन मतदाता और उसके परिजनों के नाम पूरी तरह बदलकर नई पहचान दर्ज कर दी गई। नियमों के अनुसार, किसी भी सुधार के लिए फॉर्म 8 और पहचान संबंधी दस्तावेज अनिवार्य हैं। लेकिन सॉफ्टवेयर ने अधिकारियों को बिना आवश्यक दस्तावेज अपलोड किए ही आवेदनों को स्वीकृत करने की अनुमति दी।

बूथ स्तर के अधिकारियों द्वारा घर-घर जाकर सत्यापन करना अनिवार्य होता है। हालांकि, नियमों और सॉफ्टवेयर ने ईआरओ को यह अधिकार दे दिया कि वे इस भौतिक सत्यापन को दरकिनार कर अपनी मर्जी से संशोधनों को मंजूरी दे सकें। इन दो कमियों के कारण वैध मतदाता सूची से गायब हो गए और फर्जी नाम जुड़ गए, जिससे फर्जी मतदान का रास्ता साफ हो गया। पीड़ित असली मतदाता को इसका पता तभी चलता जब वह मतदान केंद्र पहुंचता, जबकि उसके नाम पर बना नया फर्जी मतदाता पहले ही वोट डाल चुका होता।