जनता का सत्ता से सवाल पूछने का दौर
देश के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में समय-समय पर ऐसे मोड़ आते हैं, जो सोये हुए समाज को झकझोर कर जगा देते हैं। हालिया घटनाक्रमों और आंदोलनों के बाद देश भर में जिस तरह का जन-आक्रोश सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक देखने को मिल रहा है, उसने एक बड़े बदलाव का संकेत दिया है। युवा और आम जनता, जो पिछले कई वर्षों से सत्ता के सामने लगभग मूकदर्शक बनी हुई थी, आज भाजपा नेताओं और सत्तासीन तंत्र से सीधे सवाल पूछ रही है।
हिंसा और आक्रोश की छिटपुट घटनाओं को यदि एक तरफ रख भी दें, तो इस पूरे घटनाक्रम से उभरा सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है—देश की जनता ने अचानक अपनी वह पुरानी और बुनियादी आदत वापस पा ली है, जिसे वह लगभग भूल चुकी थी, यानी सत्ता से सवाल पूछने की आदत। पश्चिम बंगाल की राजनीति में कभी टीएमसी नेताओं के खिलाफ अंडा थेरेपी जैसा राजनीतिक प्रयोग करने वाली भाजपा को शायद यह अंदाजा नहीं था कि जनता का जन-आक्रोश किसी दिन उसी हथियार को सत्ता पक्ष की ओर मोड़ देगा। देश के कई हिस्सों में हुई घटनाएं इस बात का गवाह हैं कि राजनीति में किसी को नीचा दिखाने के लिए शुरू की गई थेरेपी जब जनता के गुस्से का रूप लेती है, तो वह किसी दल या झंडे का लिहाज नहीं करती। हिंसा यकीनन लोकतंत्र का रास्ता नहीं हो सकती, लेकिन इसके पीछे छिपे जन-आक्रोश और असंतोष को नजरअंदाज करना भी सत्ता के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।
इस बदलते माहौल का मनोवैज्ञानिक प्रभाव अब साफ नजर आने लगा है। जो लोग कभी गाड़ियों पर भाजपा का झंडा लगाकर चलना सुरक्षा, प्रभाव या फायदे की गारंटी मानते थे, वे अब बेहद सतर्क हो गए हैं। झारखंड की राजधानी रांची की सड़कों पर भी यह बदलाव प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है। जिन गाड़ियों पर कभी शान से भगवा झंडे लहराया करते थे, अब वहां से वे झंडे नदारद हैं या फिर केवल पार्टी कार्यालय के आसपास ही गाड़ियों पर झंडे लगाए जा रहे हैं।
कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के बाद उभरी इस नई स्थिति ने सत्ताधारियों और उनके समर्थकों में एक किस्म की हिचकिचाहट पैदा कर दी है। फायदा और अवसरवाद के दम पर लहराने वाले झंडे, जनता के जमीनी विरोध के सामने ढीले पड़ते दिख रहे हैं।दूसरी तरफ, सोशल मीडिया जो कभी एकतरफा प्रचार और सत्ता समर्थित नैरेटिव का सबसे मजबूत किला हुआ करता था, अब सवाल-जवाब का अखाड़ा बन चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अतीत में किए गए लोकलुभावन वादों—चाहे वह रोजगार हो, महंगाई हो या आर्थिक वादे—को लेकर आम नागरिक अब खुलकर टिप्पणी कर रहे हैं।
ट्रॉलिंग और डिजिटल दबाव का डर अब गायब होता दिख रहा है। लोग अब केवल चुनावी नारों पर ताली बजाने के बजाय पिछले वादों का हिसाब मांग रहे हैं। इसी बीच ई-20 जनता पार्टी के गठन से देश में एक नई राजनीतिक हलचल और जन-आंदोलन की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। यह नया ढांचा उन युवाओं और नागरिकों को एक मंच प्रदान कर रहा है जो लंबे समय से एक विकल्प और अपनी आवाज की तलाश में थे। हालांकि किसी भी नए राजनीतिक दल का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह इस जन-आक्रोश को कितनी परिपक्वता और सकारात्मक दिशा दे पाता है, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि इसने मौजूदा राजनीतिक बहस को नई धार दी है।
लोकतंत्र का असली सौंदर्य किसी पार्टी की प्रचंड जीत में नहीं, बल्कि नागरिक के सजग होने में है। जब जनता बिना किसी भय के सत्ता की आंखों में आंखें डालकर पूछने लगे कि आपने जो कहा था, उसका क्या हुआ?, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र जीवित हो उठा है। जो समाज सवाल पूछना बंद कर देता है, वह अपनी आज़ादी खो बैठता है। आज देश का आम नागरिक, युवा और मध्यम वर्ग अपनी उस खोई हुई शक्ति को पहचान चुका है। यह बदलाव केवल किसी एक दल के विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात का पैगाम है कि देश में अब जवाबदेही तय करने का दौर लौट आया है। जाहिर तौर पर जिन्हें इन सवालों से परेशानी है, वे दरअसल आंतरिक तौर पर लोकतंत्र से दूर जा चुके थे। अब जनता कान पकड़कर उन्हें इसी रास्ते पर लाने का काम कर रही है। साथ ही सत्ता का हर फैसला जायज की दलील को अब जनता भी नकार रही है, जो लोकतंत्र के मजबूत होने का स्पष्ट संकेत है। एक बात और है कि अब खुद नरेंद्र मोदी भी समझ चुके हैं कि उनकी मीडिया, जिसे गोदी मीडिया कहा जाता है, अब जनता तक उनकी बातों को नहीं पहुंचा पा रही है। मजबूरी में वह भी सीधा संवाद का रास्ता अपना चुके हैं।