मालदा का बड़ा इलाका अब कटान और डूब के खतरे में
नदी का कटाव तेज होता जा रहा
कई घर और भवन पानी में गये
नदी में गाद भरने से यह परेशानी
राष्ट्रीय खबर
मालदाः पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के मानिकचक ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले भूतनी क्षेत्र में गंगा नदी की भू-आकृति और भीषण नदी कटाव की स्थिति वर्तमान में अत्यंत चिंताजनक और भयावह स्तर पर पहुंच चुकी है। देश-विदेश के नामचीन नदी विशेषज्ञों और भू-वैज्ञानिकों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों के अंतराल में गंगा ने अपना मुख्य प्रवाह मार्ग लगभग 6 किलोमीटर तक बदल लिया है, जिससे भूतनू और उसके आसपास के विशाल भौगोलिक क्षेत्र में निवास करने वाले लाखों आम नागरिकों के जीवन पर एक गहरा और आसन्न संकट मंडराने लगा है। गंगा के इस बेहद असामान्य मार्ग परिवर्तन और लगातार हो रहे खौफनाक कटाव के तांडव को देखते हुए विशेषज्ञों ने यह स्पष्ट मत व्यक्त किया है कि केवल तात्कालिक कृत्रिम तटबंधों या कमजोर बांधों के सहारे इस विकराल प्राकृतिक आपदा को रोक पाना पूरी तरह से असंभव है।
गंगा नदी का जलस्तर अचानक बढ़ने के कारण हाल ही में भूतनी क्षेत्र में करोड़ों रुपये की भारी-भरकम लागत से तैयार किया गया रिंग बांध अचानक भरभराकर ढह गया, जिससे प्रशासन और स्थानीय लोगों के होश उड़ गए। घनी आबादी वाले रिहायशी और कृषि बहुल इलाकों में अत्यंत तेजी से नदी का तूफानी पानी घुसने के कारण वहां के लाखों लोगों के बीच भगदड़ मच गई और एक भीषण बाढ़ का खौफ पूरे क्षेत्र में छा गया।
स्थानीय निवासियों का दर्द यह है कि हर साल बरसात के मौसम का आगमन उनके लिए यह कटाव और जलप्रलय एक लाइलाज अभिशाप की तरह लेकर आता है। हालांकि, जिला प्रशासन और सिंचाई विभाग युद्धस्तर पर मरम्मत कार्य में अपनी पूरी ताकत से जुटे हुए हैं, लेकिन नदी के इस अत्यंत उग्र वेग और भयंकर दबाव के आगे वे तमाम अस्थायी तकनीकें और उपाय टिक नहीं पा रहे हैं।
भू-आकृति और नदी विज्ञान (हाइड्रोलॉजी) के प्रमुख जानकारों का यह पुख्ता मानना है कि गंगा और फुलहर नदियों के संयुक्त जल-प्रवाह के प्रभाव तथा पिछले लंबे समय से तलहटी में बड़े पैमाने पर जमा हुई भारी गाद के कारण नदी का निचला हिस्सा बेहद उथला हो गया है, जिससे उसकी कुल जल-वहन क्षमता बुरी तरह प्रभावित हुई है।
इस अत्यंत शक्तिशाली और अप्रत्याशित जलधारा को केवल कागजी या सतही तटबंधों के भरोसे स्थाई रूप से रोक पाना कतई मुमकिन नहीं है। नदी विशेषज्ञों का मुख्य जोर इस बात पर है कि संकटग्रस्त स्थानीय आबादी को सुरक्षित बचाने के लिए किसी भी प्रकार के अल्पकालिक और सतही उपायों की बजाय दीर्घकालिक, व्यावहारिक और वैज्ञानिक नदी-प्रबंधन रणनीतियों को तुरंत जमीन पर उतारा जाए, अन्यथा इस संवेदनशील क्षेत्र को निकट भविष्य में और भी बड़े विध्वंस तथा मानवीय त्रासदी का सामना करना पड़ सकता है।