नवंबर में होने वाले कड़े मुकाबले के चुनाव से पहले फैसला
वेलिंगटनः न्यूजीलैंड की राजनीतिक फिजा में इस समय चुनावी सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच गई है, क्योंकि आगामी राष्ट्रीय चुनावों के मद्देनजर देश की संसद को आधिकारिक रूप से भंग कर दिया गया है। इस कदम के साथ ही देश में एक बेहद कड़े और रोमांचक चुनावी मुकाबले का औपचारिक आगाज हो चुका है, जिस पर पूरी दुनिया की राजनीतिक निगाहें टिकी हुई हैं। आने वाले नवंबर महीने में होने वाले आम चुनाव यह तय करेंगे कि आने वाले दिनों में देश की कमान किस राजनीतिक दल या गठबंधन के हाथ में होगी।
संसद के भंग होने से पहले अंतिम सत्र के दौरान सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं ने जोरदार बहस और अपनी आखिरी चुनावी पिच पेश की। मौजूदा जनमत सर्वेक्षणों के आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि इस बार का मुकाबला बेहद कांटे का और दिलचस्प होने वाला है। लेबर पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन और मुख्य विपक्षी सेंटर-राइट (मध्य-दक्षिणपंथी) गुट के बीच सत्ता हासिल करने के लिए कड़ी टक्कर देखने को मिल रही है। किसी भी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिलने के आसार कम नजर आ रहे हैं, जिसके कारण चुनाव के बाद गठबंधन सरकार बनने की पूरी संभावना जताई जा रही है।
न्यूजीलैंड की अनूठी चुनावी प्रणाली, जिसे मिक्स्ड-मेम्बर्स प्रोपोर्शनल (एमएमपी) सिस्टम कहा जाता है, के तहत अक्सर किसी एक पार्टी को अपने दम पर पूर्ण बहुमत मिलना कठिन होता है। ऐसे में छोटी पार्टियां किंगमेकर की भूमिका में नजर आती हैं और सरकार के गठन में उनकी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी होती है। इस बार भी कई छोटी पार्टियां 5 प्रतिशत के थ्रेशोल्ड को पार करने के लिए संघर्ष कर रही हैं, जो चुनाव के अंतिम परिणामों को किसी भी दिशा में मोड़ सकती हैं।
संसद भंग होने के बाद अब सभी राजनीतिक दलों के नेता और उम्मीदवार सीधे जनता के बीच जाकर अपने एजेंडे को रखेंगे और मतदाताओं को रिझाने का प्रयास करेंगे। महंगाई, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक मुद्दों पर तीखी बहस के बीच यह चुनाव देश के राजनीतिक भविष्य की नई इबारत लिखेगा। आगामी हफ्तों में होने वाले प्रचार अभियान यह तय करेंगे कि न्यूजीलैंड की अगली सरकार की बागडोर किसके हाथों में सौंपी जाएगी।