सीजेपी नेताओँ की हिरासत की अवधि बढ़ने पर न्यायिक सवाल
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेताओं आशुतोष रांका और सौरव दास की हिरासत अवधि बढ़ाने तथा ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नेहा बोरा को नोटिस जारी किए जाने के बाद विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेटों की शक्तियां चर्चा में आ गई हैं।
एसईएम शांति भंग को रोकने के लिए कुछ शक्तियों का प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन वे मुकदमों (ट्रायल) की सुनवाई नहीं कर सकते। अदालतों ने बार-बार इस बात पर सवाल उठाए हैं कि इन शक्तियों का इस्तेमाल कैसे किया जाता है, और प्रक्रियात्मक उल्लंघनों व व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर इसके प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की है।
रांका और दास को 14 अक्टूबर को विरोध प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर सुरक्षा में सेंध लगाने और जंतर-मंतर में प्रवेश करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। सोमवार को, एक एसईएम ने उनकी हिरासत दो दिन और बढ़ा दी, जिससे कुल हिरासत अवधि सात दिन हो गई।
दिल्ली पुलिस के एसीपी स्तर के अधिकारी एसईएम रितु राज द्वारा हस्ताक्षरित आदेश में कहा गया कि रांका और दास का आचरण विश्वास योग्य नहीं था, उन्हें कानून का कोई सम्मान नहीं है और वे बार-बार एक गैर-अधिसूचित स्थल पर विरोध प्रदर्शन का आह्वान करते रहे हैं। ले जाए जाते समय दास ने एसईएम को पुलिस अदालत करार दिया और कहा कि वहाँ कोई न्याय नहीं है।
इस बीच, नेहा बोरा ने एक अन्य एसईएम महेश कुमार मीणा द्वारा जारी नोटिस को चुनौती दी है, जिसमें उनसे शांति भंग की संभावना का हवाला देते हुए शांति बांड निष्पादित करने का कारण बताने को कहा गया है। कार्यपालक मजिस्ट्रेट सरकार के अधीन कार्य करते हैं और न्यायिक शक्तियों का प्रयोग नहीं करते हैं। उनकी पदोन्नति, वेतन वृद्धि और वरिष्ठता कार्यपालिका के भीतर उनके वरिष्ठों पर निर्भर करती है।
पारंपरिक रूप से कार्यपालक मजिस्ट्रेट राजस्व या प्रशासनिक अधिकारी होते रहे हैं। राष्ट्रीय राजधानी में, दिल्ली पुलिस अधिनियम केंद्र सरकार को पुलिस आयुक्त और एसीपी रैंक से ऊपर के अधीनस्थ अधिकारियों को जिला और कार्यपालक मजिस्ट्रेटों की शक्तियों का उपयोग करने के लिए अधिकृत करने का अधिकार देता है। एसईएम के पास सीमित शक्तियाँ होती हैं, जो मुख्य रूप से सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के निवारक उपायों से संबंधित होती हैं। दूसरी ओर, न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायपालिका (उच्च न्यायालयों) द्वारा प्रशासित होते हैं और वे मुकदमों की सुनवाई कर सकते हैं। वर्ष 1969 में 41वें विधि आयोग की रिपोर्ट में तर्क दिया गया था कि निवारक उपाय व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करते हैं, इसलिए यह शक्ति विशेष रूप से न्यायिक मजिस्ट्रेटों के माध्यम से न्यायपालिका में निहित होनी चाहिए।
2018 में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया था कि निवारक गिरफ्तारी प्रावधानों के तहत न्यायिक हिरासत की अवधि एक समय में सात दिनों से अधिक नहीं होनी चाहिए और एसईएम द्वारा हिरासत जारी रखने की आवश्यकता की साप्ताहिक समीक्षा की जानी चाहिए।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत निवारक गिरफ्तारी और सुरक्षा प्रावधानों की जड़ें 1361 के ब्रिटिश जस्टिस ऑफ पीस एक्ट से जुड़ी हैं। यह प्रावधान 1861 में भारत के आपराधिक प्रक्रिया ढांचे में शामिल हुआ, जो आजादी के बाद दंड प्रक्रिया संहिता और अब 1 जुलाई 2024 से लागू हुई बीएनएसएस में भी जारी है।