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लोकतंत्र में विरोध अनिवार्य शर्त हैः भागवत

ऑनलाइन सामग्री पर सरकारी अंकुश अब समय की मांग

फ्रांस और अल्बानिया का उल्लेख किया

शक्तियां भारत का विकास नहीं चाहती

समाज में कड़वाहट कतई पैदा ना हो

राष्ट्रीय खबर

मुंबईः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन अनिवार्य हैं, लेकिन उनका उद्देश्य समाधान खोजना होना चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञान कुमार के नेतृत्व में भारत निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण के खिलाफ हो रहे व्यापक प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में उनके ये बयान आए हैं।

नागपुर में संघ के वार्षिक विजयदशमी उत्सव समारोह को संबोधित करते हुए भागवत ने बांग्लादेश, नेपाल, फ्रांस और अल्बानिया में हाल ही में हुए उथल-पुथल का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि अपने स्वार्थों को साधने वाली ताकतें राजनीतिक परिस्थितियों को बदलने के साधन के रूप में सत्ता परिवर्तन का उपयोग करती हैं, जिससे शायद ही कभी इच्छित परिणाम मिलते हैं। उन्होंने कहा, वे दावा करते हैं कि शासन बदलने से स्थिति बदल जाएगी, लेकिन वास्तव में ऐसा कभी नहीं हुआ है।

भागवत ने कहा कि एक मजबूत भारत ऐसी ताकतों को सीमित करेगा, जिससे देश इसे कमजोर और विभाजित करने के प्रयासों का निशाना बन जाएगा। उन्होंने कहा कि हालांकि कुछ वैश्विक शक्तियां भारत को विकसित देखना चाहती हैं, लेकिन वे नहीं चाहतीं कि यह बहुत शक्तिशाली बने, क्योंकि यह उनके वर्चस्व को चुनौती दे सकता है। उन्होंने कहा, समस्याएं बनी रहेंगी, और लोकतंत्र में विरोध अनिवार्य हैं। लेकिन विरोध का उद्देश्य क्या होना चाहिए? उनका उद्देश्य समाधान ढूंढना होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जब विरोध प्रदर्शन जनहित के अलावा अन्य उद्देश्यों से प्रेरित होते हैं, तो वे राजनीतिक साधन बन सकते हैं, जिससे व्यक्तियों, समूहों या विचारधाराओं के प्रति शत्रुता को बढ़ावा मिलता है। भागवत ने राजनीतिक नेताओं, प्रदर्शनकारियों और प्रशासन से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि उनकी कार्रवाइयों से समाज में कड़वाहट या विभाजन पैदा न हो। उन्होंने कहा, चाहे हमारी भावनाएं कितनी भी तीव्र क्यों न हों, हमें अपने संविधान द्वारा तय सीमाओं, सभ्य सार्वजनिक चर्चा के मानदंडों और शालीन आचरण के मानकों का सम्मान करना चाहिए।

भागवत ने युवा पीढ़ी द्वारा जानकारी प्राप्त करने में अधिक विवेक बरतने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। अनियंत्रित सामग्री, विशेषकर ओटीटी प्लेटफार्मों के प्रतिकूल प्रभावों पर चिंता जताते हुए, उन्होंने सरकार से समाज के हित में उचित नियमों पर विचार करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि प्रतिकूल परिणामों का अनुभव करने के बाद, कई देशों ने सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर नियम और प्रतिबंध लगाए हैं। भारत में भी, समाज तेजी से ऐसे उपायों की आवश्यकता को पहचान रहा है, विशेषकर ओटीटी प्लेटफार्मों के संबंध में।

साथ ही, भागवत ने कहा कि भले ही जानकारी स्वतंत्र रूप से उपलब्ध हो, युवा पीढ़ी को विवेक का अभ्यास करना और उचित तथा अनुचित के बीच अंतर करना सिखाया जाना चाहिए। उनके ये बयान ऐसे समय में आए हैं जब कई राज्यों में पुलिस पर ज्यादातर युवाओं के नेतृत्व वाले शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग करने का आरोप लगाया गया है। इस तरह के पहले आंदोलन के परिणामस्वरूप देश के शिक्षा मंत्री पद से धर्मेंद्र सरकार का इस्तीफा देना पड़ा था। सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सोशल मीडिया पर गंभीर और तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा है।

मध्य भारत में इजराइल के महावाणिज्यिक यानिव रेवाच ने आरएसएस के इस कार्यक्रम में भाग लिया। उन्होंने कहा, यह इस कार्यक्रम का मेरा पहला अनुभव है। मैंने कल (सोमवार को) डॉ. मोहन भागवत से मुलाकात की और हमारी बातचीत हुई। हम इस बात पर सहमत हुए कि भारत और इजराइल न केवल समान मूल्य साझा करते हैं, बल्कि दुर्भाग्य से समान चुनौतियों का भी सामना करते हैं।