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जनता को ज्यादा आजमाना बंद करें

जनता के धैर्य की एक निश्चित सीमा होती है और उस सीमा से अधिक उसकी सहनशक्ति की परीक्षा लेना किसी भी हुकूमत के लिए घातक साबित हो सकता है। इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि जब-जब सत्ताओं ने जनभावनाओं को कुचलने या उनकी उपेक्षा करने का प्रयास किया है, तब-तब जनता ने चुनावी परिणामों और आंदोलनों के जरिए ऐसा करारा जवाब दिया है, जिससे बड़े-बड़े साम्राज्यों और संगठनों की नींव हिल गई है।

यदि हम सबसे पहले ब्राजील की ओर नजर दौड़ाएं, तो वहाँ का राजनीतिक घटनाक्रम वैचारिक और जनता के आक्रोश का एक ज्वलंत उदाहरण है। हालांकि आधिकारिक तौर पर अमेरिका ने कभी भी ब्राजील के चुनावी मामलों में सीधे हस्तक्षेप करने की बात खुलेआम स्वीकार नहीं की, लेकिन बोल्सानोरो के इस प्रकार देश छोड़कर भाग जाने के बाद इस बात में किसी भी प्रकार के संदेह की कोई गुंजाइश नहीं बचती कि बाहरी ताकतों और जनविरोधी नीतियों का अंत किस प्रकार होता है।

इसी प्रकार, सर्बिया में शासन की तानाशाही प्रवृत्ति के अन्य शासकों का हाल भी किसी से छिपा नहीं रहा है। छात्रों के एक साहसी और मुखर आंदोलन से उठी असंतोष की आग ने वहां के तानाशाही शासन को पूरी तरह से राख कर दिया था। इसी कड़ी में अब दुनिया भर की राजनीति को अपनी उंगलियों पर नचाने और हर देश को आंख दिखाने वाले अमेरिकी नेताओं का राजनीतिक भविष्य भी सवालों के घेरे में आ गया है।

खुद को नोबेल शांति पुरस्कार का प्रबल दावेदार बताने और दुनिया भर में कई युद्धों को रुकवाने या युद्धविराम कराने का दावा करने वाले डोनाल्ड ट्रंप के लिए भी परिस्थितियां आसान नहीं रही हैं। मध्य पूर्व में इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर किए गए हमलों और सैन्य कार्रवाइयों ने ट्रंप की नीतियों को घरेलू मोर्चे पर उनके लिए ही गले की हड्डी बना दिया है।

भारत के राजनीतिक परिदृश्य पर व्यापक चर्चा करने से पहले यदि हम दो अन्य महत्वपूर्ण वैश्विक उदाहरणों पर गौर करें, तो स्थिति और अधिक स्पष्ट हो जाती है। पहला देश चीन है, जहां औपचारिक रूप से एक ही पार्टी का शासन है और कम्युनिस्ट पार्टी का एकछत्र राज है, लेकिन खुद राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी अपनी दूसरी कतार के युवा और सक्षम नेतृत्व को आगे बढ़ने से लगातार रोकते आ रहे हैं।

भ्रष्टाचार के खात्मे के नाम पर चलाए गए अभियानों की आड़ में शी जिनपिंग ने कई ऐसे वरिष्ठ और प्रभावी नेताओं को महत्वपूर्ण पदों से चलता कर दिया, जो भविष्य में उनके नेतृत्व के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकते थे। दूसरा प्रमुख उदाहरण तुर्किए का है, जहां राष्ट्रपति रेचप तय्यिप एर्दोआन भी अपने तमाम राजनीतिक विरोधियों, पत्रकारों और आलोचकों को ठिकाने लगाने या जेल की सलाखों के पीछे भेजने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर सत्ता को अपने हाथों में केंद्रित करने की यह प्रवृत्ति आज वैश्विक स्तर पर कई देशों में देखी जा रही है। ठीक इसी तर्ज पर, यदि हम अपने देश भारत की ओर देखें तो वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शासनकाल भी कुछ-कुछ ऐसी ही प्रवृत्तियों की याद दिलाता है। एक तरफ जहां सरकार की कार्यप्रणाली में तानाशाही के स्पष्ट संकेत दिखाई देते हैं, वहीं दूसरी तरफ इसे एक मजबूत लोकतांत्रिक मुखौटे के पीछे छिपाने का पूरा प्रयास किया जाता है।

एक समय ऐसा था जब यह सोचना भी आम आदमी के कल्पना के परे था कि देश के भीतर नरेंद्र मोदी के निर्णयों या उनकी नीतियों का इस कदर मुखर विरोध भी हो सकता है। देश के युवाओं यानी जेन-जी ने अचानक ऐसा राजनीतिक परिदृश्य और प्रतिरोध पैदा कर दिया कि आज खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पूरी कार्यप्रणाली बैकफुट पर नजर आने लगी है।

संसद के भीतर विपक्षी नेता राहुल गांधी से तीखी बहस करने की खुली चुनौती देने वाले गृह मंत्री अमित शाह भी शायद यह भूल गए थे कि जब दिल्ली पुलिस की ज्यादतियों और देश के गंभीर मुद्दों पर संसद के भीतर जवाब मांगने की बारी आई, तो देश के गृह मंत्री होने के बावजूद वे खुद सदन से गायब रहे। इन तमाम वाकयों से यह भली-भांति समझ लेना चाहिए कि दुनिया भर में आम जनता, चाहे वह किसी भी देश, जाति, धर्म या भौगोलिक परिस्थिति की क्यों न हो, उसकी अंतर्निहित राजनीतिक, निजी और सामाजिक समझदारी पर कभी भी शक नहीं किया जाना चाहिए।

आम आदमी भले ही रोजमर्रा की जिंदगी में शांत और सहनशील नजर आए, लेकिन जब बात उसके अधिकारों और भविष्य की आती है, तो वह स्थान, काल और परिस्थिति का बारीकी से आकलन कर अचानक ऐसा अचूक और निर्णायक फैसला लेता है, जिससे बड़ी से बड़ी और अजेय समझी जाने वाली सरकारें भी हिल जाती हैं।