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राजनीति के वैश्विक तूफान से मौसम समझिए

ब्राजील में लुईज इनासियो लूला द सिल्वा की जीत के कई अलग-अलग कारण रहे हैं, जिनमें सोशल मीडिया पर कुछ ही दिनों का प्रचार अभियान सबसे ज्यादा उल्लेखनीय है। पहले चरण के चुनाव में लूला पीछे चल रहे थे और उन्होंने दूसरे चरण में जीत हासिल की। चुनाव परिणामों के सामने आने के बाद से ही पूरी दुनिया में वामपंथियों के बीच जश्न का माहौल साफ नजर आ रहा है।

इसके साथ ही, सर्बिया, संयुक्त राज्य अमेरिका या इज़राइल में जो कुछ भी घटित हो रहा है, उसे देखकर यह बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि दक्षिणपंथी राजनीति फिलहाल बहुत सहज या सुरक्षित स्थिति में है। नवंबर 2024 में सर्बिया के नोवी साद शहर में एक रेलवे स्टेशन की छत ढह जाने से 16 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई थी। इस भीषण हादसे के बाद वहां बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ एक छात्र आंदोलन की शुरुआत हुई, जो समय के साथ धीरे-धीरे पूरे देश में एक व्यापक सरकार विरोधी आंदोलन में तब्दील हो गया।

इस उग्र जनआंदोलन के भारी दबाव के चलते जनवरी 2025 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मिलोश वुचेविच को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था, लेकिन इसके बावजूद जनता और छात्रों का विरोध प्रदर्शन थमा नहीं। हाल ही में संपन्न हुए 25 अक्टूबर के चुनावों के शुरुआती नतीजों से यह साफ पता चलता है कि छात्र-समर्थित उम्मीदवारों ने भारी बहुमत हासिल करते हुए 52.7 प्रतिशत वोट प्राप्त किए हैं और संसद में अपनी स्पष्ट बहुमत दर्ज कराई है।

इसके विपरीत, लंबे समय से सत्ता में काबिज अलेक्जेंडर वुचेविच के राजनीतिक खेमे को मात्र 39.2 प्रतिशत वोटों से ही संतोष करना पड़ा है। इसका सीधा अर्थ यह है कि इस प्रभावशाली छात्र आंदोलन ने सीधे तौर पर चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित किया है और देश में एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। ब्राजील के चुनाव परिणामों और सर्बिया की इस राजनीतिक उठापटक का विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि दुनिया के अलग-अलग कोनों में राजनीति अब पारंपरिक ढर्रे से हटकर आगे बढ़ रही है।

जहाँ एक ओर ब्राजील में लूला द सिल्वा ने सोशल मीडिया के चतुर और सटीक उपयोग के बल पर पिछड़ने के बावजूद शानदार वापसी की, वहीं सर्बिया में युवाओं और छात्रों की एक नई पीढ़ी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाकर सत्ता के समीकरणों को हिला कर रख दिया। इन घटनाओं से यह बात साबित होती है कि आज की तारीख में जनता और विशेषकर युवा वर्ग बदलाव लाने के लिए पूरी तरह से तैयार है।

वैश्विक स्तर पर वामपंथी और दक्षिणपंथी ताकतों के बीच एक लंबी और गहरी वैचारिक खींचतान जारी है। एक तरफ जहां ब्राजील की जीत वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों के लिए उत्साहजनक रही है, वहीं सर्बिया जैसे देशों में सत्ता परिवर्तन यह संकेत देता है कि जनता अब शासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और शुचिता चाहती है। पारंपरिक राजनीतिक दल अब केवल पुराने नारों के सहारे लंबे समय तक सत्ता में नहीं टिक सकते।

चाहे वह सोशल मीडिया का प्रभावी प्रबंधन हो या फिर जमीन पर उतरा हुआ कोई मजबूत छात्र आंदोलन, राजनीति की दिशा तय करने में अब नए माध्यमों और जन-भागीदारी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो गई है। आने वाले समय में वैश्विक राजनीति की यह सुई किस करवट बैठेगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि दुनिया भर के शासक दल जनहित की इन अपेक्षाओं को कितनी गंभीरता से लेते हैं।

अब अमेरिका के मध्यावधि चुनाव से डोनाल्ड ट्रंप को भी बहुत अधिक खुश नहीं होना है। अगर कांग्रेस में डेमोक्रेट्स की ताकत बढ़ती है तो यह तय हो जाएगा कि शेष समय के लिए डोनाल्ड ट्रंप एक कठपुतलि राष्ट्रपति बनकर रह जाएंगे। अपनी आदत के मुताबिक वह अब भी धमकी देने से बाज नहीं आ रहे हैं। इन तमाम परिस्थितियों पर गौर कर यह समझा जा सकता है कि वैश्विक राजनीति की आंच से अब भारत भी अछूता नहीं है।

जिस तरीके से इन देशों में सत्तारूढ़ सत्ता ने हर कुछ हथियाना चाहा था, जनता ने सड़क पर उतरकर उस साजिश का बंटाधार कर दिया। अब भारत में भी अचानक ही कॉकरोच कुछ ऐसे उभरे कि जिस सरकार अथवा सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी के खिलाफ कुछ बोलने से लोग कतराते थे, इन युवाओँ ने उनका मजाक बनाकर रख दिया। ऊपर से नई परेशानी उस कथित पप्पू की है, जिसे पप्पू बनाने में हजारों करोड़ रुपये खर्च हुए। अब वही पापा बनकर भाजपा के नेताओं तक को सड़क पर उतार रहा है। समय का लेख अगर इतिहास के जरिए पढ़ा जाए तो यह लेखन साफ है कि जिन मुद्दों पर मोदी सरकार जनसमर्थन हासिल करती थी, उनका समय अब बीत चुका है यानी वे एक्सपायर हो चुके हैं।