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राज्यों को कर लगाने का अधिकार हैः सुप्रीम कोर्ट

वर्ष 1974 में दिया गया पुराना फैसला ही प्रभावी रहेगा

सात जजों की संविधान पीठ का फैसला

जीएसटी के बाद यह सैद्धांतिक मुद्दा है

ओडिशा का मामला यहां पहुंच गया था

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को फैसला सुनाते हुए कहा कि बिक्री कर (सेल्स टैक्स) पर अतिरिक्त कर या सरचार्ज लगाने के राज्यों के अधिकार को सही ठहराने वाला वर्ष 1974 का 5-न्यायाधीशों की संविधान पीठ का फैसला आगे भी प्रभावी रहेगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि 27 साल पुराना यह संवैधानिक संदर्भ अब महज एक अकादमिक (सैद्धांतिक) विषय बन कर रह गया है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 7-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से निर्णय दिया कि जीएसटी कानून के लागू होने और संबंधित पुराने कानूनी प्रावधानों के बदल जाने के कारण अब इस कानूनी प्रश्न पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता नहीं रह गई है। मुख्य न्यायाधीश ने अपनी और 5 अन्य न्यायाधीशों की ओर से निर्णय लिखते हुए कहा कि संदर्भित प्रश्न अब व्यावहारिक महत्व का नहीं रहा है और यह एक अकादमिक मुद्दा बन चुका है, इसलिए 7-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा इस पर विचार करने का आधार नहीं बचता।

इस संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश के अलावा न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन, न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची, न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया, न्यायमूर्ति अरुण पल्ली और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे। न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने एक अलग सहमति निर्णय लिखा। पीठ ने 1974 के एस. कोडर बनाम केरल राज्य मामले के ऐतिहासिक फैसले को सही ठहराते हुए स्पष्ट किया कि बिक्री कर पर लगाया गया अतिरिक्त कर वास्तव में बिक्री कर की दर में वृद्धि ही है और यह संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची-2 की प्रविष्टि 54 के तहत राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है।

यह विवाद मुख्य रूप से ओडिशा बिक्री कर अधिनियम, 1947 की धारा 5ए को चुनौती देने से उत्पन्न हुआ था, जिसके तहत 10 लाख से 1 करोड़ रुपये के कारोबार वाले व्यापारियों पर 10 प्रतिशत और 1 करोड़ से अधिक के कारोबार पर 15 प्रतिशत का अतिरिक्त कर लगाया गया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह आयकर (इनकम टैक्स) के समान है जो संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है, न कि राज्यों के। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी प्रस्तुत किया कि वर्ष 2017 में देश में जीएसटी व्यवस्था लागू होने के बाद से यह विवाद व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी और अकादमिक हो चुका है, क्योंकि पुराने कानून के तहत बेहद सीमित मामले ही अब लंबित बचे हैं।