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न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग का मामला

लोकसभा अध्यक्ष सभी से बातचीत कर फैसला लेंगे

नईदिल्लीः लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि वे न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया से जुड़े नियमों का अध्ययन करेंगे और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं से परामर्श करेंगे। एक संसदीय जांच समिति द्वारा उनके सरकारी आवास से नकदी मिलने से संबंधित आरोपों में दोषी पाए जाने के बाद यह कदम उठाया जा रहा है।

न्यायाधीश (जांच) अधिनियम के तहत बिरला द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति ने न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ बिना हिसाब-किताब की नकदी, संदेहास्पद साक्ष्य और टालमटोल भरे जवाबों सहित अन्य आरोपों को ‘सिद्ध’ पाया था। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट अगस्त में संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत की थी।

इसके बाद न्यायमूर्ति वर्मा ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से अपना त्यागपत्र दे दिया था, लेकिन कानून मंत्रालय ने अभी तक इसकी स्वीकृति की अधिसूचना जारी नहीं की है। उनका नाम अभी भी उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सूची में दर्ज है।

केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में एक सम्मेलन के दौरान बिरला ने संवाददाताओं से कहा, हम भविष्य की कार्रवाई तय करने से पहले नियमों का अध्ययन करेंगे और राजनीतिक दलों के नेताओं से परामर्श करेंगे। संसदीय जांच समिति का गठन सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों गठबंधनों के लगभग 200 सांसदों द्वारा संसद के माध्यम से न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने की मांग किए जाने के बाद किया गया था।

उच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा सौंपे गए त्यागपत्र की स्थिति पर सूत्रों का कहना है कि उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के त्यागपत्र को आमतौर पर स्वीकृत ही माना जाता है। हालांकि, इस मामले में त्यागपत्र संसद द्वारा हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के बाद आया, जिसके कारण इसकी स्वीकृति अभी अधिसूचित नहीं की गई है।

यह विवाद 14 मार्च 2025 की रात का है, जब दिल्ली में न्यायमूर्ति वर्मा के सरकारी आवास में आग लग गई थी। आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों को एक स्टोर रूम से जले हुए नोटों का बड़ा ढेर मिला था। इसके बाद न्यायमूर्ति वर्मा को दिल्ली उच्च न्यायालय से इलाहाबाद उच्च न्यायालय स्थानांतरित कर दिया गया था।

संबंधित कानूनों और उच्चतम न्यायालय के फैसलों का अध्ययन करने के बाद, दिल्ली उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने आरोपों को गंभीर माना और आंतरिक प्रक्रिया शुरू की। इसके बाद भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने मार्च 2025 में तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की। समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद खन्ना ने न्यायमूर्ति वर्मा से इस्तीफा देने या महाभियोग का सामना करने को कहा।

जब न्यायाधीश ने पद छोड़ने से इनकार कर दिया, तो मुख्य न्यायाधीश ने जांच रिपोर्ट और न्यायमूर्ति वर्मा का जवाब राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजते हुए उन्हें पद से हटाने की सिफारिश की। इसके बाद अध्यक्ष ओम बिरला ने महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करते हुए इस संसदीय समिति का गठन किया था। अध्यक्ष ने जोर दिया था कि निष्कलंक चरित्र, वित्तीय ईमानदारी और बौद्धिक सत्यनिष्ठा ही वह आधार हैं, जिन पर आम नागरिक न्यायपालिका में विश्वास रखते हैं।