एनकाउंटर का महिमा मंडन बंद हो
जब देश भर में गुजरात मॉडल की गूंज सुनाई दे रही थी और मोदी सरकार की लोकप्रियता आसमान छू रही थी, तब अपराधियों पर नकेल कसने के लिए एनकाउंटर की सफलता को गुजरात के घर-घर में सेलिब्रेट किया जाता था। उस स्वर्णिम काल में डी.जी. वंजारा गुजरात पुलिस के आतंक-विरोधी दस्ते के प्रमुख और एक चर्चित एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के रूप में उभरे थे। लेकिन वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि वह कानूनी शिकंजे में फंस गए।
हालांकि नरेंद्र मोदी उस समय कई अन्य नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों को कानून के जाल से सुरक्षित बाहर निकालने में सफल रहे थे, लेकिन वंजारा और कुछ अन्य अधिकारियों को जेल की चारदीवारी से रिहा कराने में वे असमर्थ रहे। उस विकट दौर में जेल की कोठरी से एक विस्फोटक पत्र बाहर आया था, जिसे 1 सितंबर 2013 को वंजारा ने खुद लिखा था। उन्होंने उस खत में लिखा था, देश के किसी भी हिस्से में शायद ही इतने लंबे समय तक पुलिस अधिकारियों को इस तरह जेल में रखा गया हो।
इन अधिकारियों को मानसिक और शारीरिक यातनाएं देने के अलावा इस पूरी साजिश का कोई और उद्देश्य नहीं हो सकता था। जबकि ये सभी अधिकारी सरकार के सबसे वफादार सिपाही थे, जिन्होंने किसी भी प्रलोभन में आए बिना पूरी ईमानदारी, निष्ठा और नैतिक मूल्यों के साथ पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का मुकाबला किया था। अब पश्चिम बंगाल में जिस तेजी से पुलिस मुठभेड़ या एनकाउंटर में मौत की घटनाएं बढ़ रही हैं, उसे देखकर वंजारा का वह ऐतिहासिक पत्र अचानक से स्मृतियों के पटल पर पूरी स्पष्टता के साथ जीवंत हो उठता है।
यदि आने वाले समय में इस राज्य के किसी एनकाउंटर स्पेशलिस्ट को भी अपनी ही सरकार के खिलाफ इसी तरह का कोई पत्र लिखना पड़े, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए। इससे पहले ऐसा ही हाल हमने उत्तरप्रदेश में भी देखा है। स्वाभाविक रूप से आम नागरिकों के जहन में बारुईपुर एनकाउंटर की वह पुरानी घटना एक बार फिर ताजा हो उठी है। उस समय भी ठीक इसी तरह की पटकथा के तहत आरोपी की मौत हुई थी।
हर बार पुलिस की तरफ से यही घिसा-पिटा स्पष्टीकरण दिया जाता है कि आरोपी ने पुलिस का हथियार छीनने का दुस्साहस किया और भागते हुए पुलिस को निशाना बनाकर गोलियां चलाईं, जिसके बाद मजबूरन पुलिस को आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी। पुलिस के इन दावों में कितनी सच्चाई है और यह तर्क कितना जायज है, इसका तत्कालिन और निष्पक्ष मूल्यांकन तुरंत संभव नहीं है।
यदि इन मामलों को लेकर लंबी कानूनी लड़ाइयां शुरू होती हैं, तो देश की अदालतें एक दिन इन सभी पेचीदगियों और झोलों की परत-दर-परत गहराई से जांच करेंगी। लेकिन इस बीच, हम जैसे आम नागरिकों और देश के विवेकशील समाज के मन में दो गंभीर और गहरे संशय आषाढ़ के घने बादलों की तरह धीरे-धीरे मंडराने लगे हैं। क्या इस राज्य की पुलिस आज इतनी अकुशल और अक्षम हो चुकी है कि दुष्कर्म और हत्या जैसे गंभीर अपराध के किसी दुर्दांत आरोपी को घटनास्थल पर ले जाते समय वह अपनी ही सर्विस रिवॉल्वर या हथियार को संभालने में असमर्थ रहती है?
या फिर मोदी जी के गुजरात से चलकर उत्तर प्रदेश के रास्ते अब इस बंगाल की धरती पर भी एनकाउंटर कल्चर का एक नया और स्थायी दौर पूरी दृढ़ता से शुरू हो चुका है? देश में पुलिस और प्रशासन द्वारा किए जाने वाले गैर-न्यायिक हत्याओं या फर्जी मुठभेड़ों पर लगाम कसने के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 23 सितंबर 2014 को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था।
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम महाराष्ट्र राज्य के बहुचर्चित मामले में भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश लोढ़ा और न्यायमूर्ति नरीमन की खंडपीठ ने कुल सोलह सूत्रीय विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए थे। यह गाइडलाइन इस उद्देश्य से तैयार की गई थी कि यदि भविष्य में कभी भी एनकाउंटर में किसी व्यक्ति की मौत होती है, तो उसकी एक पारदर्शी, प्रभावी और पूरी तरह से स्वतंत्र जांच सुनिश्चित की जा सके, ताकि पुलिस बल की असीमित और स्वेच्छाचारी तानाशाही शक्तियों पर एक प्रभावी कानूनी नियंत्रण स्थापित किया जा सके।
विडंबना यह है कि इन तमाम सख्त कानूनी प्रावधानों और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के बावजूद देश भर में एनकाउंटर में होने वाली मौतों के सिलसिले पर आज तक कोई ठोस रोक नहीं लग पाई है। जब से नई राजनीतिक सत्ता का प्रादुर्भाव हुआ है, तब से लेकर आज तक सभी सत्तारूढ़ लगातार यह हुंकार भरते रहे हैं कि अब किसी भी अपराधी को बख्शा नहीं जाएगा और उसका सीधा सफाया कर दिया जाएगा। असल में पुलिस और प्रशासनिक तंत्र के हाथों में एक बेलगाम और अनियंत्रित ताकत सौंप देता है। इसे रोकना और पुलिस के हर एनकाउंटर का महिमा मंडन करना देश की व्यवस्था को कमजोर करने वाला ही है।