साढ़े तीन सौ साल पुरानी पूजा की कई कहानियां
इलाके के गरीबों के लिए मसीहा थी वह
अंग्रेजों और जमींदारों के खिलाफ खड़ी थी
महिला सम्मान और नारी जागरण की प्रतीक
राष्ट्रीय खबर
जलपाईगुड़ी: जलपाईगुड़ी की देवी चौधुरानी श्मशानकाली आज भी श्रद्धालुओं द्वारा पूजी जाती हैं। इस नाम के साथ आस्था के अलावा इतिहास और भावनाएं भी गहराई से जुड़ी हुई हैं। कई लोगों का दावा है कि इस देवी चौधुरानी श्मशानकाली मंदिर से साहित्य सम्राट बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के प्रसिद्ध उपन्यास के लोकप्रिय पात्र देवी चौधुरानी की जीवनगाथा जुड़ी हुई है।
जलपाईगुड़ी शहर से सटे गोशाला मोड़ पर राष्ट्रीय राजमार्ग-27 के किनारे यह ऐतिहासिक मंदिर स्थित है। सदियों पुराने विशाल वृक्षों से घिरे इस स्थान पर पहले घना और रहस्यमयी जंगल हुआ करता था। समय के साथ पेड़ भले कम हुए हों, लेकिन यहाँ का वातावरण आज भी रहस्यमय और शांत है।
प्राचीन काल में यानी देवी चौधुरानी के समय यहाँ इतना बड़ा मंदिर नहीं था, बल्कि एक बड़ा जंगल, पास से बहती रुकरुका नदी और एक श्मशान घाट था। कहा जाता है कि भवानी पाठक और देवी चौधुरानी ने अपने दल-बल के साथ इसी जंगल में अपना ठिकाना बनाया था। गरीबों के लिए वे अन्नदाता थे, जबकि अत्याचारी अंग्रेजों और जमींदारों के लिए साक्षात मां काली।
प्रचलित जनश्रुतियों के अनुसार, लगभग 350 साल पहले स्थानीय निवासियों ने इस श्मशान के पास श्मशानकाली की आराधना शुरू की थी। इसके बाद 1785 के आसपास देवी चौधुरानी और भवानी पाठक ने यहाँ अपना ठिकाना बनाया। उन्हीं के प्रयासों से श्मशानकाली का पहला स्थायी मंदिर बना। भवानी पाठक के निधन के बाद देवी चौधुरानी ने अपने दल की कमान संभाली।
देवी चौधुरानी के निधन के बाद नयन कापालिक नाम के एक तांत्रिक ने यहाँ पूजा जारी रखी। मान्यता है कि नयन कापालिक ने ही पहली बार मंदिर में एक स्थानीय निवासी की नरबलि दी थी, जिसके अपराध में ब्रिटिश सरकार ने उसे फांसी की सजा सुनाई थी। इसके बाद जलपाईगुड़ी के तत्कालीन राजपरिवार ने इस मंदिर की पूजा का दायित्व संभाला।
वर्तमान में मंदिर का संचालन एक ट्रस्ट द्वारा किया जाता है। पहले यहाँ मिट्टी की प्रतिमा थी, जबकि अब कसौटी पत्थर की उग्र-दर्शना मूर्ति स्थापित की गई है। माता के हाथ में कोई शस्त्र नहीं है; एक हाथ में मदिरा का पात्र और दूसरे हाथ में नरमुंड है। यहाँ पूजा पूरी तरह से तंत्र विधि से होती है, जिसमें आचमन भी मदिरा से किया जाता है। माता को आमिष भोग के रूप में शोल या बोआल मछली का व्यंजन अर्पित किया जाता है। इसके अलावा, काली पूजा की रात बकरे की बलि की परंपरा भी है। भक्तों का मानना है कि इस मंदिर की देवी अत्यंत जागृत हैं।