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छह सौ साल पुरानी पूजा में पांडुलिपि का प्रयोग

पितृपक्ष के दौरान ही प्रारंभ हो जाती है पूजा की गतिविधियां

जिताष्टमी के अगले दिन से विधान

तालपत्र की पांडुलिपियों से मंत्र पाठ

महाकवि कालीदास के रचित मंत्र हैं

राष्ट्रीय खबर

कोलकाताः पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा को लेकर अनगिनत प्राचीन पौराणिक और ऐतिहासिक कहानियां जुड़ी हैं, वहीं दूसरी तरफ इनमें अलौकिक और रहस्मय छौंक भी देखने को मिलती है। ग्रामीण बंगाल की पारंपरिक पारिवारिक पूजाएं इसी वजह से एक-दूसरे से बेहद खास और अलग साबित होती हैं।

अनुमान है कि करीब 600 साल पहले एथोड़ा गांव में बड़ी दुर्गा की पूजा का श्रीगणेश हुआ था। यह गांव की पहली दुर्गापूजा थी। हालांकि समय के साथ गांव में कई अन्य पारिवारिक पूजाएं भी शुरू हुईं, लेकिन इसी प्राचीन पूजा की परंपराओं और नियमों को मानकर बाकी पूजाएं भी आगे बढ़ीं। परिवार के सदस्य अमिताभ चक्रवर्ती बताते हैं कि एथोड़ा गांव की इस दुर्गापूजा में कई तरह की अनोखी और दिलचस्प विशेषताएं हैं। यहाँ महालया या षष्ठी से नहीं, बल्कि जिताष्टमी के अगले दिन यानी नवमी तिथि से ही, सामान्य दुर्गापूजा से पूरे 15 दिन पहले ही बड़ी दुर्गा की पूजा का आगाज हो जाता है।

लगभग 600 साल पुरानी इस बड़ी दुर्गा पूजा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि आज भी यहाँ आधुनिक किताबों या कागजों के बजाय तालपत्र (ताड़ के पत्तों) पर लिखी गई प्राचीन पांडुलिपियों से मंत्रों का उच्चारण करके ही माँ की आराधना की जाती है। सैकड़ों साल पहले पुरखों से मिली इन तालपत्र की पांडुलिपियों को सहेज कर रखा गया है और उन्हीं को पढ़कर माँ की पूजा-अर्चना की जाती है। परिवार के लोगों का कहना है कि महाकवि कालिदास के कालखंड में जिन दुर्गा मंत्रों का प्रयोग किया जाता था, वही दुर्लभ मंत्र उनकी इस पांडुलिपि में लिखे हुए हैं। इस प्रकार, यह पूजा कहीं न कहीं प्राचीन कालिदास के उस ऐतिहासिक काल से अपना एक गहरा जुड़ाव महसूस कराती है। आज इस हाईटेक और डिजिटल युग में भी चक्रवर्ती और मुख़र्जी परिवारों में लाल शालू में बंधी उन्हीं पुरानी तालपत्र की पांडुलिपियों को पढ़कर ही दुर्गापूजा संपन्न कराई जाती है। पूजा के इन विशेष दिनों में तालपत्र की इन अनोखी पांडुलिपियों के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है।

सबसे आश्चर्य की बात यह है कि भले ही समय के चक्र के साथ कलाकार बदले हों, क्योंकि पीढ़ियां बदली हैं, लेकिन माँ के मुख और चेहरे के बनावट में कभी कोई बदलाव नहीं आया है। जिस तरह मूर्ति बनाने वाले कारीगर एक ही परिवार से आते हैं, ठीक उसी तरह यहाँ ढोल और ढाक बजाने वाले ढाकी भी पीढ़ियों से इसी बड़ी दुर्गा के मंदिर में अपनी सेवा देते आ रहे हैं। इसके अलावा, जो पुरोहित इस पूजा को विधि-विधान से संपन्न कराते हैं, वे भी इसी विशेष परिवार से आते हैं।