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चुनाव आयोग की निष्पक्षता की जांच जरूरी

भारत के चुनाव आयोग का गठन इस बात को सुनिश्चित करने के लिए किया गया था कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा इस बात की होड़ न बन जाए कि चुनाव की मशीनरी पर किसका नियंत्रण है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े हालिया घटनाक्रम बताते हैं कि अब इस सिद्धांत को एक ऐसी परीक्षा का सामना करना पड़ रहा है जो मतदाता सूचियों को लेकर चल रहे विवाद से कहीं आगे तक जाती है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण है। मृत, दोहरी प्रविष्टि वाले या अन्यथा अपात्र नामों को सूची से हटाना एक आवश्यक प्रशासनिक कार्य है।

लेकिन, मतदाता सूची केवल एक ऐसा डेटाबेस नहीं है जिसकी समय-समय पर सफाई की जानी चाहिए। हर प्रविष्टि के पीछे किसी नागरिक का सरकार चुनने में भाग लेने का अधिकार छिपा होता है। जब लाखों नाम गायब हो जाते हैं, भले ही वे वैध रूप से हटाए गए हों, तो इस प्रक्रिया को ऐसे मजबूत सुरक्षा उपायों की आवश्यकता होती है जो प्रशासनिक सुधार और गलत तरीके से बाहर किए जाने की प्रक्रिया के बीच स्पष्ट अंतर कर सकें, क्योंकि इससे नागरिकों के बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार का उपयोग करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

हालांकि, जिस बात ने इस विवाद को एक संस्थागत संकट में बदल दिया है, वह आयोग के भीतर से ही सामने आई रिपोर्टें हैं। खबरों के अनुसार, अन्य दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, ने पुनरीक्षण और अन्य चुनावी प्रक्रियाओं से संबंधित निर्णयों पर बार-बार आपत्ति जताई है। वहीं, आयोग का कहना है कि उसके सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। यह विरोधाभास इतना महत्वपूर्ण है कि इसे केवल एक-दूसरे के दावों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

यदि मतभेद उत्पन्न हुए थे, तो जनता यह जानने की हकदार है कि उन्हें कैसे संभाला गया। यदि उन्हें सामूहिक रूप से सुलझाया गया था, तो इसका रिकॉर्ड इस बात की पुष्टि करना चाहिए। दिल्ली और मुंबई में हुए प्रदर्शनों ने इस विवाद को एक नया आयाम दे दिया है। विपक्षी दल कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं, जबकि कॉकरोच जनता पार्टी और अन्य समूहों ने इस मुद्दे को सड़कों पर ला दिया है। जानबूझकर फेरबदल किए जाने के उनके आरोपों को केवल इसलिए स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता क्योंकि उन्होंने बड़े पैमाने पर प्रदर्शनों को जन्म दिया है।

लेकिन इन प्रदर्शनों को भी केवल पक्षपातपूर्ण आंदोलन कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। जब नागरिकों को यह विश्वास होने लगने कि चुनाव कराने वाली संस्था पर भरोसा नहीं किया जा सकता, तो इससे होने वाला नुकसान किसी एक चुनाव से कहीं आगे तक जाता है। यहीं पर चुनाव आयोग के सामने एक ऐसी जिम्मेदारी आती है जिसे बार-बार यह दावा करके पूरा नहीं किया जा सकता कि उसकी प्रक्रियाएं कानून सम्मत हैं। कानून का पालन जरूरी है, लेकिन जनता के विश्वास के लिए यह जरूरी है कि निष्पक्षता साफ तौर पर दिखाई दे।

आयोग को अपनी प्रक्रियाओं को इतना पारदर्शी बनाना होगा जिससे यह स्पष्ट हो सके कि नामों को हटाने के निर्णय कैसे लिए गए, वास्तविक मतदाताओं को कैसे बहाल किया जा सकता है और आंतरिक असहमतियों को कैसे दर्ज व हल किया जाता है। बड़ा खतरा यह नहीं है कि भारत के राजनीतिक गलियारों का एक पक्ष आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाएगा।

कड़े मुकाबले वाले चुनावों में ऐसे आरोप लगना स्वाभाविक है। खतरा यह है कि राजनीतिक स्पेक्ट्रम से जुड़े तमाम नागरिक इस बात पर विश्वास करना बंद कर देंगे कि चुनावी रेफरी अपनी निष्पक्षता साबित करने में सक्षम है। यही कारण है कि यह वर्तमान विवाद ज्ञानेश कुमार या किसी भी राजनीतिक दल के राजनीतिक भविष्य से परे गहन जांच की मांग करता है। भारत के लोकतंत्र को यह आवश्यकता नहीं है कि चुनाव आयोग आलोचनाओं से परे हो। इसे एक ऐसे चुनाव आयोग की जरूरत है जो आलोचनाओं का जवाब ठोस सबूतों के साथ देने में सक्षम हो।

जहां तक ज्ञानेश कुमार का सवाल है, उन्हें अपने उन पूर्ववर्तियों से सीख लेनी चाहिए जिन्होंने पूरी ईमानदारी के साथ अपने दायित्वों का निर्वाह किया, न कि उन कुछेक लोगों से जिन्होंने अपने आचरण से इस पद की गरिमा को ठेस पहुंचाई है। अब बदले माहौल में इस बात की सामाजिक परख होने लगी है कि जिस मकसद से चुनाव आयोग को बनाया गया था। वह लोकतंत्र की कसौटी पर चुनाव आयोग खरा उतर पाता है या नहीं। इसके साथ ही जुड़ा हुए दूसरा सवाल यह है कि जब विपक्ष और सीजेपी के लोग सड़कों पर चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं तो इस आंदोलन के खिलाफ भाजपा क्यों खड़ी हो रही है। देश की जनता के धैर्य की इतनी अधिक परीक्षा लेना खतरनाक है।