पिछले पचास सालों से यह रहस्य अनसुलझा ही था
जंगलों में आबादी अचानक घटी थी
अनेक नमूनों का विश्लेषण किया
कुछ ने प्रतिरोध विकसित किया है
राष्ट्रीय खबर
रांचीः वर्ष 1970 और 1980 के दशक में ब्राजील के वन से मेंढकों की आबादी अचानक घटने के पीछे साइट्रिड नामक एक घातक फंगल बीमारी मुख्य वजह पाई गई। वैज्ञानिकों ने दशकों पुराने 370 से अधिक संरक्षित मेंढकों के नमूनों का विश्लेषण किया, जिससे पता चला कि 1979 के बाद इस फंगस का संक्रमण तेजी से फैला था। हालांकि फंगस अब भी मौजूद है, लेकिन कई प्रजातियों ने पीढ़ियों के साथ इसके प्रति सहनशीलता विकसित कर ली है और उनकी आबादी में सुधार देखा जा रहा है।
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1970 के दशक से दर्ज की गई इस गिरावट का सटीक कारण अब तक अनसुलझा था। स्मिथसोनियन नेशनल जू एंड कंजर्वेशन बायोलॉजी इंस्टीट्यूट और पेनसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के नए अध्ययन से पता चला है कि इसके पीछे साइट्रिडियोमायकोसिस नाम की घातक फंगल बीमारी जिम्मेदार थी। यह बीमारी सूक्ष्म कवक से होती है।
माना जाता है कि यह रोगजनक एशिया से शुरू होकर 1970 और 1980 के दशक में दुनियाभर में फैला, लेकिन इसे 1999 में ही औपचारिक रूप से पहचाना जा सका। तब तक वैश्विक स्तर पर मेंढकों की सैकड़ों प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी थीं।
अनुसंधानकर्ताओं ने ब्राजील के बोराकेया बायोलॉजिकल स्टेशन से दशकों पहले एकत्र कर संग्रहालयों में रखे गए 370 से अधिक मेंढकों के नमूनों का परीक्षण किया। जांच में पाया गया कि 1979 से पहले के किसी भी नमूने में फंगस नहीं था, जबकि 1980 के दशक के नमूनों में से आधे से अधिक संक्रमित पाए गए। इससे स्पष्ट हुआ कि बीमारी का प्रसार और मेंढकों की आबादी का गिरना एक ही समय में हुआ।
अध्ययन में यह अनोखा तथ्य भी सामने आया कि जो प्रजातियां अत्यधिक प्रभावित होकर गायब हो गईं, उनके नमूनों में संक्रमण नहीं दिखा। वैज्ञानिकों का मानना है कि वे प्रजातियां इतनी संवेदनशील थीं कि संक्रमित होते ही तुरंत मर गईं, जबकि जीवित बची प्रजातियों में इस फंगस को सहने की प्राकृतिक क्षमता विकसित हो गई थी।
2022 से 2024 के बीच किए गए हालिया सर्वेक्षणों से उम्मीद की किरण जगी है। ऐतिहासिक नमूनों की 17 प्रजातियों में से 12 प्रजातियां आज भी वहां मौजूद हैं और फंगस की उपस्थिति के बावजूद मेंढकों की आबादी धीरे-धीरे ठीक हो रही है। वैज्ञानिक अब डीएनए विश्लेषण के जरिए यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि मेंढकों ने इस बीमारी के खिलाफ अनुवांशिक प्रतिरोध कैसे विकसित किया, ताकि भविष्य की महामारियों से वन्यजीवों को बचाया जा सके।
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