राजनीतिक गलियारों में ‘चैन’ शब्द का इस्तेमाल बहुत ही दुर्लभता के साथ देखने को मिलता है। हालांकि, राजनीति की भागदौड़ और लगातार व्यस्त रहने वाली दिनचर्या के बीच कुछ नेता विदेश दौरों के नाम पर चैन की सांस लेने का थोड़ा बहुत मौका निकाल ही लेते हैं। जब कोई राजनेता हवाई जहाज की लंबी उड़ान भर रहा होता है, तो उस दौरान विमान के भीतर कौन क्या कर रहा है, इसका कोई लाइव प्रसारण नहीं होता है। ऐसे में यदि कोई नेताजी विमान में आराम से खर्राटा भरकर सो भी रहे हों, तो भी उनके करीबी और दरबारी यही दावा करते नजर आते हैं कि साहब आसमान की ऊंचाइयों पर उड़ते हुए भी देश की महत्वपूर्ण फाइलें निपटा रहे हैं।
मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य कुछ ऐसा ही बन गया है जहां हुजूर की रातों की नींद और दिन का चैन पूरी तरह से गायब हो चुका है। इस राजनीतिक उथल-पुथल की शुरुआत तब हुई जब माई लॉर्ड द्वारा गलती से तेलचट्टा जैसे विवादास्पद शब्द का इस्तेमाल कर दिया गया। एक छोटे से वाक्य या शब्द ने भारतीय राजनीति की दशा और दिशा दोनों को पूरी तरह से बदलकर रख दिया। शुरुआत में इसे महज एक मजाक या तंज के रूप में सोशल मीडिया पर एक अभियान के तौर पर शुरू किया गया था, लेकिन किसी ने शायद यह कल्पना भी नहीं की थी कि यह सोशल मीडिया ट्रेंड इतनी तेजी से तूल पकड़ लेगा और मुख्यधारा की राजनीति को हिलाकर रख देगा। इस पूरे वाकये की शुरुआत करने वाले अभिजीत दिपके ने भी शायद यह नहीं सोचा होगा कि उनके द्वारा शुरू की गई बात इतनी दूर तक जाएगी। यह विवाद किसी तरह से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे जैसे घटनाक्रमों के साथ संभल ही रहा था कि इंडियन एक्सप्रेस ने चुनाव आयोग का बम फोड़ दिया । इस मीडिया रिपोर्ट और खुलासों ने सरकार की साख और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
खुद देश के मुखिया का भरोसा पारंपरिक टीवी चैनलों और गोदी मीडिया से डिग गया है। स्थिति यह हो गई कि अब वे पारंपरिक माध्यमों को छोड़कर सीधे देश के युवाओं के साथ संवाद स्थापित करना चाहते थे। लेकिन ज़मीनी हकीकत और जनता के मूड भांपने में ये सारे नुस्खे बेकार साबित हुए। दूसरी तरफ, राजनीतिक विरोधियों की ओर से जिसे पप्पू करार देने और उसकी छवि बिगाड़ने में पानी की तरह करोड़ों रुपये खर्च किए गए थे, वही शख्स आज सरकार के लिए एक बहुत बड़ा सिरदर्द और राजनीतिक चुनौती बन चुका है। तमाम तरह की कोशिशों, विज्ञापनों और सरकारी प्रचार के बाद भी आम मतदाता यानी मैंगो मैन के मन में यह गंभीर संदेह घर कर गया है कि देश की संवैधानिक संस्थाओं में सब कुछ कतई ठीक नहीं चल रहा है। हालात यह हैं कि ऐसा लगता है जैसे वहां भी विपक्ष का कोई गुप्त जासूस बैठा है जो सीमा खन्ना जैसी हस्तियों की कारगुजारियों और अंदरूनी बहसों की हर पोल बाहर खोल रहा है।
इस तरह के राजनीतिक तनाव को देखकर प्रसिद्ध पुरानी फिल्म प्राण जाए पर वचन ना जाए का एक गीत बरबस ही याद आ जाता है। इस बेहतरीन गीत को जाने-माने गीतकार एस.एच. बिहारी ने अपने शब्दों से पिरोया था और इसे अमर संगीत में ओ.पी. नय्यर ने ढाला था। अपनी जादुई और दर्द भरी आवाज से इस गीत को स्वर कोकिला आशा भोंसले ने जीवंत कर दिया था।
चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया
ज़हर भी चाहा अगर, पीना तो पीने ना दिया
चैन से हमको कभी
चांद के रथ में रात की दुल्हन जब जब आएगी
याद हमारी आपके दिल को तरसा जाएगी
आपने जो है दिया, वो तो किसीने ना दिया
ज़हर भी चाहा अगर, पीना तो पीने ना दिया
चैन से हमको कभी
आपका ग़म जो इस दिल में दिन-रात अगर होगा
सोचके ये दम घुटता है फिर कैसे गुज़र होगा
काश ना होती अपनी जुदाई मौत ही आ जाती
कोई बहाने चैन हमारी रूह तो पा जाती
इक पल हँसना कभी दिल की लगी ने ना दिया
ज़हर भी चाहा अगर, पीना तो पीने ना दिया
पहले तो कहा था कि फकीर आदमी हूं झोला उठाकर चल दूंगा लेकिन अब तो वक्त बदल चुका है। झोला उठाकर भाई लोग चैन से चलने भी नहीं देंगे। सरकारी फाइलों में पता नहीं कौन कौन से राज दफन है। अब आम जनता और खुद सत्ताधारी यह सोचने पर मजबूर हैं कि आखिर इस राजनीतिक तनाव से मुक्ति पाने और चैन से जीने के लिए क्या किया जाए। स्थिति यह हो चुकी है कि आज की तारीख में राजनीति के गलियारों में जो भी दांव चला जा रहा है, वह सब का सब उल्टा ही पड़ता नजर आ रहा है।