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देश में वामपंथी आंदोलन का अंति किला भी ढह गया

केरल में यूडीएफ को ऐतिहासिक जनादेश

राष्ट्रीय खबर

तिरुअनंतपुरमः केरल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने राज्य की राजनीति में एक युगांतरकारी परिवर्तन ला दिया है। कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे ने 140 सदस्यीय विधानसभा में 100 से अधिक सीटें जीतकर शानदार वापसी की है। इस प्रचंड लहर ने माकपा  के नेतृत्व वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चे के पिछले एक दशक से चले आ रहे शासन का अंत कर दिया है। यह जीत न केवल सत्ता परिवर्तन है, बल्कि केरल के राजनीतिक इतिहास में एक बड़ा बदलाव भी है, क्योंकि वामपंथियों ने अपना आखिरी राष्ट्रीय गढ़ भी खो दिया है।

राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, यूडीएफ की इस सफलता के पीछे शासन और वित्तीय कुप्रबंधन के प्रति जनता का गहरा असंतोष और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप मुख्य कारण रहे। यूडीएफ ने खुद को एक अनुशासित और एकजुट विकल्प के रूप में पेश किया, जिसका श्रेय विपक्ष के नेता वी.डी. सतीशन की कार्यशैली को दिया जा रहा है। इसके साथ ही, मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यकों के ठोस समर्थन ने यूडीएफ के पक्ष में चुनावी समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया।

दूसरी ओर, वामपंथी खेमा आंतरिक कलह और विद्रोह की आग में झुलसता नजर आया। माकपा के कई दिग्गज नेताओं ने पार्टी से दरकिनार किए जाने के बाद निर्दलीय चुनाव लड़ा, जिन्हें यूडीएफ ने अपना समर्थन दिया। अंबलप्पुझा से जी. सुधाकरण, पय्यानूर से वी. कुन्हीकृष्णन और तलिपरंबा से टी.के. गोविंदम जैसे बागियों की जीत ने माकपा के दशकों पुराने किलों को ध्वस्त कर दिया। विशेष रूप से, कुन्हीकृष्णन की जीत भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़े प्रतीक के रूप में उभरी, जिन्होंने पार्टी के भीतर ही फंड की हेराफेरी का मुद्दा उठाया था।

इस चुनावी आंधी में एलडीएफ सरकार के कई कद्दावर मंत्री अपनी सीटें नहीं बचा पाए, जिनमें वीणा जॉर्ज, एम.बी. राजेश और पी. राजीव जैसे नाम शामिल हैं। भाजपा ने भी इस बार अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए तीन सीटों पर जीत हासिल की है, जिससे केरल की पारंपरिक द्विध्रुवीय राजनीति में तीसरा मोर्चा मजबूत हुआ है। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के बाद, केरल में वामपंथ की यह हार राष्ट्रीय स्तर पर कम्युनिस्ट राजनीति के भविष्य पर गंभीर सवालिया निशान लगाती है।