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हिंदुवादी नेता के वीडियो का मसला शीर्ष अदालत में फंस गया

ऐसे मामलों को हल्के में नहीं लिया जाएः सुप्रीम कोर्ट

स्वतंत्र भारद्वाज ने दिया था बयान

अदालत ने इसे गंभीर प्रकृति का माना

किसी को ऐसी छूट कतई नहीं मिलेगी

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक बेहद गंभीर और संवेदनशील मामले पर सुनवाई करते हुए गुरुवार को मौखिक रूप से कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के एक विरोध प्रदर्शन में शामिल होने वाली 14 वर्षीय एक नाबालिग लड़की को लगातार परेशान किए जाने और उसे डराने-धमकाने के आरोप अत्यंत गंभीर हैं तथा इन्हें किसी भी कीमत पर हल्के में नहीं लिया जा सकता है। इस हाई-प्रोफाइल मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की एक विशेष पीठ द्वारा की जा रही है।

सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत के समक्ष यह चौंकाने वाला तथ्य रखा गया कि जिस नाबालिग लड़की और उसके परिवार को न्याय मिलना चाहिए था, उसी पीड़ित बच्ची के खिलाफ पुलिस ने एक जवाबी प्राथमिकी दर्ज कर दी है। इसके अलावा, अदालत को यह भी अवगत कराया गया कि इस विवाद के बाद से लगातार धमकियों का सामना कर रही इस नाबालिग के घर पर अज्ञात उपद्रवियों द्वारा पथराव जैसी हिंसक घटनाएं भी अंजाम दी गई हैं।

वकीलों ने अदालत को बताया कि हिंदुत्व से जुड़े एक प्रभावशाली व्यक्ति और पॉडकास्टर स्वतंत्र भारद्वाज ने सार्वजनिक रूप से एक वीडियो पॉडकास्ट में डींग हांकते हुए और गर्व महसूस करते हुए यह खुलेआम स्वीकार किया था कि उसने उक्त नाबालिग लड़की के पिता का सिर फोड़ दिया था। इसके बावजूद, मुख्य आरोपियों और उनके साथ आए लोगों के खिलाफ त्वरित सख्त कानूनी कार्रवाई करने के बजाय, पुलिस ने कथित तौर पर दबाव में आकर उस पीड़ित बच्ची के ऊपर ही एफआईआर थोप दी।

मामले की संवेदनशीलता को पूरी तरह समझते हुए सुप्रीम कोर्ट की इस तीन सदस्यीय पीठ ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने घोषणा की है कि वह उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की सरकारों व पुलिस प्रशासन से इस पूरे मामले में एक विस्तृत स्थिति रिपोर्ट तलब करेगी। इस रिपोर्ट में मुख्य रूप से उस विवादास्पद एफआईआर की वर्तमान स्थिति, नाबालिग लड़की तथा उसके पूरे परिवार की सुरक्षा के लिए स्थानीय प्रशासन द्वारा उठाए गए कदमों, और उसके घर पर हमला करने तथा डराने-धमकाने वाले आरोपियों के खिलाफ अब तक की गई कानूनी कार्रवाई का पूरा ब्योरा मांगा गया है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए मौखिक रूप से टिप्पणी की कि इस तरह के मामलों को किसी भी स्तर पर नजरअंदाज या हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि किसी बच्चे के खिलाफ हुई हिंसा के मामलों में नामजद या संलिप्त आरोपी खुलेआम आज भी बेखौफ घूम रहे हैं और वे उस पीड़ित बच्चे या उसके परिवार को लगातार डराने-धमकाने का कुप्रयास कर रहे हैं ताकि वे अपनी आपराधिक शिकायत या कानूनी कार्यवाही को आगे न बढ़ा सकें, तो यह न्याय व्यवस्था के लिए एक बेहद गंभीर और चिंताजनक स्थिति है।

अदालत ने यह भी चेतावनी दी कि कानून के शासन में यदि कोई व्यक्ति इस तरह के अपराधों को स्वीकार करने के बावजूद कानून की गिरफ्त से बाहर रहकर पीड़ित पक्ष को डराता है, तो न्यायालय इसे चुपचाप बर्दाश्त नहीं करेगा। मामले की गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने संबंधित राज्यों को कड़े निर्देश जारी किए हैं।