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युद्ध रोकना है तो नोबल पुरस्कार दे दे

डोनाल्ड ट्रंप की नाराजगी इस बात पर है कि इतना कुछ करने के बाद भी उन्हें नोबल पुरस्कार क्यों नहीं दिया गया क्योंकि उन्होंने कई युद्धों को रोका था। वेनेजुएला के नोबल पुरस्कार विजेता का नोबल बतौर भेंट लेकर भी वह पूरा खुश नहीं हुए। तो अब पश्चिम एशिया की वर्तमान स्थिति से उनकी दावेदारी कहां खड़ी है, यह समझने वाली बात है। यह सवाल पूछना लाजिमी है कि क्या आधुनिक कूटनीति अब केवल मिसाइलों और ड्रोनों की भाषा तक सीमित रह गई है?

पहले वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अंतरराष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए उनके महल से अगवा किया गया, और अब ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई के आवास पर बमबारी कर उनकी हत्या कर दी गई। यह ट्रंप प्रशासन के तहत अमेरिकी दादागिरी का वह चरम रूप है, जहाँ जवाबदेही शून्य है और शक्ति ही एकमात्र सत्य है। समझने वाली बात है कि इस युद्ध का सबसे मानवीय और आर्थिक प्रभाव भारत जैसे देशों पर पड़ रहा है।

लाखों भारतीय श्रमिक, जो अपनी मेहनत की कमाई से भारत में अरबों डॉलर भेजते हैं, आज एक ऐसे युद्ध के बीच फंसे हैं जो उनका है ही नहीं। ट्रंप प्रशासन की कार्यप्रणाली को देखकर यह स्पष्ट हो गया है कि उनका अंतिम लक्ष्य कभी परमाणु समझौता था ही नहीं; उनका वास्तविक उद्देश्य इस्लामिक गणराज्य का अस्तित्व समाप्त करना था।

ये हमले ईरान को वार्ता की मेज पर लाने के लिए नहीं, बल्कि वहां आंतरिक पतन, आर्थिक तबाही और राजनीतिक विखंडन की स्थिति पैदा करने के लिए किए गए हैं। यह बिल्कुल 2003 के इराक युद्ध जैसा ही परिदृश्य है, बस इस बार लक्ष्य कहीं अधिक बड़ा, अधिक सक्षम और जवाबी कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है। वाशिंगटन का यह अनुमान कि अत्यधिक सैन्य दबाव से तख्तापलट हो जाएगा, ऐतिहासिक रूप से गलत साबित हुआ है।

अमेरिका के पास शासन परिवर्तन के बाद की कोई ठोस योजना नहीं है। क्या वे ईरान पर कब्जा करेंगे? क्या इसे विभाजित करेंगे? अफगानिस्तान, इराक और लीबिया में यही प्लेबुक विफल रही है, फिर भी इसे दोहराया जा रहा है। ऐसा लगता है कि वास्तविक उद्देश्य स्थिरता नहीं, बल्कि लंबे समय तक चलने वाली अराजकता है ताकि कोई भी क्षेत्रीय शक्ति इजरायल या अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती न दे सके। सबसे परेशान करने वाला सवाल यह है कि जब ओमान के मध्यस्थों ने जिनेवा वार्ता में वास्तविक प्रगति की सूचना दी थी, तब अमेरिका और इजरायल ने हमला क्यों किया?

युद्ध किसी उद्देश्य के लिए लड़े जाते हैं, किसी नेता की व्यक्तिगत सनक पर नहीं। यदि कूटनीति काम कर रही थी, तो परमाणु कार्यक्रम को रातों-रात रोकना असली लक्ष्य नहीं हो सकता था। इजरायल के लिए यह अपनी सबसे बड़ी क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी को खत्म करने का पीढ़ी में एक बार मिलने वाला मौका है। यह एकध्रुवीयता को बलपूर्वक थोपने का प्रयास है। इस निर्णय में न तो दुनिया से परामर्श किया गया, न ही संयुक्त राष्ट्र को विश्वास में लिया गया। यह घटना कोई इकलौती घटना नहीं है, बल्कि यह एक पैटर्न का हिस्सा है। याद कीजिए वेनेजुएला में प्रतिबंधों से दम घोंटना और फिर राष्ट्रपति की गिरफ्तारी।

ग्रीनलैंड को व्यावसायिक संपत्ति की तरह खरीदने की बात करना। ईरान से संवाद को बीच में ही छोड़कर सीधे सैन्य प्रहार करना। ये घटनाएं उस वैश्विक दृष्टिकोण को दर्शाती हैं जहाँ अंतरराष्ट्रीय कानून नहीं, बल्कि सैन्य शक्ति ही वैधता को परिभाषित करती है। विडंबना यह है कि जो राष्ट्रपति हमेशा चलने वाले युद्धों को समाप्त करने के वादे के साथ सत्ता में लौटे थे, वे अब इराक युद्ध के बाद के सबसे बड़े सैन्य जमावड़े का नेतृत्व कर रहे हैं।

ट्रंप का यह युद्ध उस विचार की हत्या है कि अमेरिकी-बाद की दुनिया आ गई है। ईरान ब्रिक्स का पूर्ण सदस्य है, फिर भी वाशिंगटन के एक फैसले ने पूरे क्षेत्र का भूगोल बदलने की कोशिश की है। इसके पीछे एक कड़वी भौतिक वास्तविकता भी है। खाड़ी देश वैश्विक तेल प्रणाली का हृदय हैं और डॉलर वह मुद्रा है जिसमें यह व्यापार होता है। ऊर्जा व्यापार को डॉलर प्रणाली से बाहर ले जाने की कोई भी कोशिश अमेरिकी शक्ति को चुनौती है। यह युद्ध केवल ईरान के बारे में नहीं, बल्कि उस आर्थिक ढांचे पर नियंत्रण बनाए रखने के बारे में है जो अमेरिकी प्रधानता की नींव है। इसलिए अब वहां आसमान से बरसते ड्रोन और मिसाइलों से मरने वाले निरीह लोगों की मौत के लिए ही सही डोनाल्ड ट्रंप को नोबल पुरस्कार के लायक समझा जाना चाहिए। उनकी परिभाषा में यह भी शांति कायम करने की एक कोशिश ही है।