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32 साल की सेवा के बाद भी प्रमोशन का इंतजार आखिर क्यों?

भट्टी के कार्यकाल में काम हुआ तो अब विलंब कैसा

  • पिछले डेढ़ साल में कितनों को लाभ

  • 1994 बैच को बेवजह रोका गया है

  • पूरे विभाग में अब इसी की चर्चा

दीपक नौरंगी

पटनाः बिहार पुलिस में इस समय पदोन्नति (प्रमोशन) में हो रही अत्यधिक देरी एक बड़ा प्रशासनिक और मानवीय मुद्दा बन गई है। सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर रैंक तक के हजारों पुलिसकर्मी लंबे समय से अपने करियर में अगली पायदान का इंतजार कर रहे हैं। इस मुद्दे पर चर्चा छिड़ी हुई है कि आखिर फाइलें कहां रुकी हैं और प्रशासनिक तंत्र की प्राथमिकताएं क्या हैं।

पुलिस गलियारों में पूर्व डीजीपी राजविंदर सिंह भट्टी के कार्यकाल को आज भी याद किया जाता है। हालांकि उनकी कार्यशैली को लेकर अलग-अलग मत हो सकते हैं, लेकिन इस बात पर विभाग के भीतर व्यापक सहमति है कि उनके समय में पदोन्नति की प्रक्रियाओं ने गति पकड़ी थी। उस दौरान सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर तक के लंबित मामलों का निपटारा हुआ, जिससे पुलिस बल के मनोबल में सकारात्मक ऊर्जा का संचार हुआ था। लेकिन वर्तमान डीजीपी विनय कुमार के डेढ़ साल से अधिक के कार्यकाल में यह प्रक्रिया फिर से सुस्त पड़ गई है, जिससे पुलिसकर्मियों में गहरी बेचैनी और निराशा है।

सबसे अधिक पीड़ादायक स्थिति 1994 बैच के पुलिस इंस्पेक्टरों की है, जिन्होंने अपनी वर्दी को 32 वर्षों से अधिक का समय समर्पित किया है। ये अधिकारी अब सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) की दहलीज पर खड़े हैं। तीन दशक से अधिक समय तक अपराध नियंत्रण, चुनाव ड्यूटी और दंगों जैसी कठिन चुनौतियों का सामना करने के बाद भी, आज वे इस भय में जी रहे हैं कि कहीं वे डीएसपी बनने का सपना लिए बिना ही सेवा से सेवानिवृत्त न हो जाएं। एक पुलिस अधिकारी के लिए समय पर पदोन्नति केवल एक पद वृद्धि नहीं, बल्कि उसकी वर्षों की सेवा और समर्पण का सम्मान होती है।

एक ही पद पर लंबे समय तक कार्य करने से अधिकारियों में कार्य के प्रति नीरसता आना स्वाभाविक है। पदोन्नति मिलने से विभाग में कार्य करने की ऊर्जा और एक नया जोश आता है। वर्तमान डीजीपी विनय कुमार की प्रशासनिक क्षमता पर प्रश्नचिह्न नहीं है, लेकिन पुलिस वेलफेयर और पदोन्नति जैसे मुद्दों पर अपेक्षित गति का अभाव उनके कार्यकाल पर सवाल खड़े कर रहा है।

पुलिस बल का मनोबल बनाए रखने के लिए नेतृत्व की प्राथमिकताओं का स्पष्ट होना अनिवार्य है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से अपेक्षा की जा रही है कि वे व्यक्तिगत रूप से इस मामले में हस्तक्षेप करें। यह केवल 1994 बैच का मामला नहीं है, बल्कि उस संपूर्ण व्यवस्था का सवाल है जो अपने कर्मियों से अटूट निष्ठा तो मांगती है, लेकिन बदले में उन्हें समय पर उचित सम्मान और अवसर देने में विफल दिख रही है। क्या ये अधिकारी अपने करियर के अंतिम पड़ाव पर वह सम्मान पाएंगे जिसके वे हकदार हैं, या यह इंतजार ही उनकी पहचान बनकर रह जाएगा?