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पारंपरिक वोट बैंक के इलाके दरक रहे है

रांची के इलाकों की राजनीति में अजीब बदलाव

  • इलाके की सोच बदली बदली सी है

  • नये वोटर नया कुछ आजमायेंगे

  • वोट बैंक का ट्रांसफर मुश्किल

राष्ट्रीय खबर

रांचीः राजधानी होने की वजह से रांची का चुनावी महत्व हमेशा से अधिक रहा है। इस बार भाजपा के मजबूत इस क्षेत्र में अजीब किस्म का बदलाव ग्रासरूट पर बदलाव दिख रहा है। दरअसल इसके पीछे जोड़ तोड़ की राजनीति का प्रभाव है, ऐसा पारंपरिक वोट बैंक के लोग मानते हैं। इसलिए अंतिम चरण में अपनी किलेबंदी को मजबूत बनाने में कौन दल अथवा प्रत्याशी सफल होगा, यह आगे के चंद दिनों की मेहनत से स्पष्ट होगा। वैसे इसके बीच यह साफ है कि भाजपा, कांग्रेस और झामुमो सभी दलों पर कैंची का प्रभाव निश्चित तौर पर होगा।

रांची की बात करें तो वर्तमान विधायक सीपी सिंह के प्रमुख वोट बैंक के इलाकों की स्पष्ट पहचान है। रातू रोड, अपर बाजार, पुरानी रांची और चुटिया ऐसे इलाके हैं, जहां से उन्हें थोक भाव में वोट मिलते रहे हैं। इन इलाकों में इस बार नई परेशानी भाजपा के लिए है। लोगों की सोच है कि इस बार सीपी सिंह को आंख बंद कर समर्थन देने का फायदा शायद मतदाताओं को नहीं मिलेगा। इसी वजह से अंदरखाने में एक विरोध का स्वर गूंज रहा है। रांची में भाजपा की एक परेशानी गुटबाजी की भी है।

दरअसल रांची सीट पर नवीन जयसवाल ने भी दावेदारी की थी। इस वजह से जिनलोगों ने अन्य समीकरणों की वजह से उस वक्त अपना मन बदला था, उनका मन दोबारा भाजपा की तरफ नहीं लौट पाया है। अब रांची के दूसरे कद्दावर प्रत्याशी झामुमो के महुआ मांझी की बात करें तो निश्चित तौर पर उसके वोट बैंक में भी कटौती महसूस की जा सकती है। झामुमो के पारंपरिक वोटर भी अपने फायदे की बात कर रहे हैं और दूसरी तरफ पिछड़ा एवं आदिवासियों का एक वर्ग झामुमो से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है।

इसके अलावा अंदर ही अंदर झारखंड आंदोलनकारियों का एक प्रभावशाली वर्ग किसी वजह से झामुमो प्रत्याशी से नाराज हो गया है। बात चीत से यह बात भी समझ में आती है कि यह नाराजगी हेमंत सोरेन अथवा महुआ मांझी की वजह से नहीं बल्कि हेमंत सोरेन के प्रेस सलाहकार की वजह से पनपी थी, जो अब तक कायम है। इसके अलावा झामुमो प्रत्याशी की दूसरी परेशानी कांग्रेस खेमा का सक्रिय नहीं होना है। जिसकी वजह से यह माना जा सकता है कि शायद इस बार भी कांग्रेस का वोट झामुमो की तरफ आने की बहुत कम उम्मीद है।

हटिया की बात करें तो भाजपा के नवीन जयसवाल और कांग्रेस के अजय शाहदेव के बीच पुराना समीकरण बदलने की खास वजह एचईसी इलाके में भाजपा के प्रति उपजी नाराजगी है। वरना यह इलाका भी भाजपा के वोट बैंक के तौर पर समझा जाता था। इस बार वहां से विरोध के स्पष्ट स्वर सुनाई पड़ रहे हैं। सुदेश महतो के साथ अपने पुराने मित्र नवीन जयसवाल के छत्तीस का रिश्ता भी आजसू को अलग कर रहा है। दूसरी तरफ अजय शाहदेव को भी झामुमो के वोट बैंक का समर्थन मिलेगा अथवा नहीं इस पर संदेह है। इसके अलावा कई प्रभावशाली समाजसेवियों के भी मैदान में होने की वजह से वोटों का बंटवारा किस तरफ होगा, यह अंतिम चरण में तय होने वाली स्थिति है।