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झारखंड के प्रेस सलाहकारों का हाल

सलाहकारों से परेशान हुए नेता और तबाह हुई पार्टी

  • पहले दौर में सब ठीक ठाक चला

  • मीडिया की दखल से काम बिगड़ा

  • बाद में सिर्फ दलाली का कारोबार

रजत कुमार गुप्ता

रांचीः झारखंड की राजनीति में अभी चंपई सोरेन का अगला कदम क्या होगा, इस पर चर्चा जारी है। इस चर्चा के बीच वह बात दब रही है कि ऐसा आखिर क्यों हुआ और साजिश में कौन कौन लोग शामिल थे। एक विफल ऑपरेशन लोट्स की खासियत यह होती है कि इस साजिश में शामिल लोगों की पूर्व से की गयी दावेदारी की वजह से यह स्पष्ट हो जाता है कि कौन कौन खिलाड़ी इस खेल के मैदान में था। इसी सवाल से नया सवाल यह उठ गया है कि झारखंड के मुख्यमंत्रियों के प्रेस सलाहकारों की गतिविधियों ने संबंधित नेता के अलावा उनके राजनीतिक दलों को कितना नुकसान पहुंचाया है।

झारखंड के अलग राज्य बनने के बाद पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने एक अनुभवी पत्रकार दिलीप श्रीवास्तव नीलू को अपना प्रेस सलाहकार बनाया था। इस दौरान में प्रेस सलाहकार के तौर पर वह अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन सही तरीके से करते रहे। राजनीतिक उथलपुथल के दौर में जब मध्य रात्रि को इंदर सिंह नामधारी यह कह रहे थे कि मैरे पैरों में घूंघरू बंधा दे तो फिर मेरी चाल देख ले, सत्ता पर अर्जुन मुंडा काबिज हुए। उन्होंने भी अपने प्रेस सलाहकार के तौर पर हरेंद्र सिंह को मनोनित किया और काम सही तरीके से चलता रहा।

अचानक से परदे के पीछे के खेल में मीडिया वाले शामिल हुए और विधायकों को भगाकर ले जाने में कौन कौन मीडिया प्रतिनिधि शामिल था, यह जगजाहिर है। इसके बाद भी राजनीति में प्रेस सलाहकारों की भूमिक वैसी नहीं हुई जो मुख्यमंत्री के खिलाफ असंतोष और विद्रोह जैसी स्थिति पैदा करे। दिशोम गुरु यानी शिबू सोरेन के प्रेस सलाहकार शफीक अंसारी के अलावा हिमांशु चौधरी को कमान मिली। हिमांशु राजनीतिक पृष्टभूमि से थे तो उनकी राजनीतिक गतिविधियां दिल्ली से चली।

उसके बाद रघुवर दास के राज में प्रेस सलाहकारों का नैतिक पतन कुछ ऐसा हुआ कि नेता के अलावा पार्टी को भी उसका दीर्घकालीन नुकसान उठाना पड़ा। रघुवर दास के दो प्रेस सलाहकारों में से एक योगेश किसलय को हटा दिये जाने के  बाद अजय कुमार का एकछत्र राज हो गया। वहां से सत्ता की दलाली और मुख्यमंत्री के नाम पर अफसरों से सीधी बात-चीत का जो दौर प्रारंभ हुआ, उससे भाजपा को कितना नुकसान हुआ, यह भाजपा वाले जानते हैं।

अगले चुनाव में हेमंत सोरेन जीतकर आये तो उन्होंने अभिषेक प्रसाद उर्फ पिंटू को अपना प्रेस सलाहकार बनाया, जिनका प्रेस का अनुभव नहीं था। उनकी एकमात्र योग्यता हेमंत के संकट के दिनों के साथी होने की थी। कुछ दिनों तक सब कुछ ठीक चलने के बाद खुद पिंटू भी पूर्व प्रेस सलाहकार अजय कुमार के करीबी लोगों के संपर्क में आये। इसके बाद प्रशासनिक कार्यों में हस्तक्षेप की वजह से वह मीडिया में चल रही सूचनाओं से कटते चले गये। नतीजा था कि ईडी की कार्रवाई के तहत खुद पिंटू को भी ईडी की पूछताछ का सामना करना पड़ा।

हेमंत सोरेन के जेल जाने के बाद विकल्प के तौर पर चंपई सोरेन को बेहतर चयन समझा गया था। चंपई ने अपने विश्वासपात्र धर्मेंद्र गोस्वामी उर्फ चंचल को प्रेस सलाहकार बनाया। वह शायद पहले से ही राजनीतिक पाठ पढ़कर आये थे तो आते ही सीधे आईएएस और आईपीएस अफसरों की हांकने की कोशिश की गलती कर बैठे। वैसे इस दौरान टाटा के वीआईपी इलाका में एक बंगला हासिल करने में कामयाबी मिली। दूसरी तरफ ऐसे प्रेस सलाहकारों ने मुख्य धारा की मीडिया के अंडरकरंट को समझने का काम नहीं किया क्योंकि उनका अपना एजेंडा था। चंपई सोरेन के जाने और हेमंत सोरेन के दोबारा आने के बाद यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि ऐसे प्रेस सलाहकारों के लिए कोई लक्ष्मण रेखा होगी अथवा नहीं।

इस कहानी का दूसरा छिपा हुआ पक्ष भी समय के साथ उजागर होता है। वह रहस्य यह है कि इन तमाम प्रेस सलाहकारों को घेरने और अपने नियंत्रण में लेने की चाल दरअसल भारतीय प्रशासनिक सेवा के उन अफसरों की थी, जो अपनी करनी की वजह से हमेशा ही विवादों में रहे।
प्रसंग से हटते हुए एक सच्ची घटना बता देता हूं। सहकारिता विभाग के कुछ कर्मचारी अपने भवन संबंधी परेशानी लेकर अपने विभागीय सचिव के पास गये। कोई निर्देश मिले, इसके लिए वह अपने साथ इंजीनियर को भी ले गये थे। समस्या सुनकर साहब ने इंजीनियर को सबके सामने काफी डांटा फटकारा। वहां से निकलते वक्त वह इंजीनियर हंसता रहा। लोगों ने पूछा तो कहा अब शाम को बुलावा आयेगा और यह पूछा जाएगा कि इस काम में उनका कितना बनता है। वह अधिकारी कभी सत्ता के केद्र में रहे लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद फिलहाल पर्दे के पीछे ही हैं।
विषय पर लौटते हैं तो यह चाल दरअसल प्रारंभिक तौर पर सर संबोधन से था। आम पत्रकार इस किस्म के संबोधन के अभ्यस्त नहीं होते। इसलिए कमजोर रीढ़ वाले इसमें फिसल गये। उसके बाद का दौर छोटा मोटा उपहार या किसी त्योहार पर महंगा गिफ्ट भेजने का था। दोनों बार मछली के जाल में फंस जाने के बाद ऐसे प्रेस सलाहकारों को अपने हाथ की कठपुतली बनाना कोई कठिन काम नहीं रहा।