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आंखों से दिखे सच को झूठ बता रही दिल्ली पुलिस

लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करना नागरिकों का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार कहाँ समाप्त होता है और कानून-व्यवस्था की सीमा कहाँ से शुरू होती है—यह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर अक्सर बहस होती रही है। हाल ही में, दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल कर छात्र विरोध प्रदर्शनों के दौरान अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों को सिरे से खारिज किया है।

बिहार के बाद अब दिल्ली पुलिस का यह कदम देश में विरोध प्रदर्शनों के प्रबंधन और पुलिस की कार्यप्रणाली पर एक नई चर्चा को जन्म देता है। यह हलफनामा उन याचिकाओं के जवाब में दायर किया गया है, जिनमें कथित पुलिस ज्यादतियों की अदालत की निगरानी में जांच की मांग की गई है। पुलिस उपायुक्त सचिन शर्मा द्वारा दायर इस काउंटर-हलफनामे में पुलिस ने अपने बचाव में तर्क दिया है कि प्रदर्शन तब तक शांतिपूर्ण थे जब तक भीड़ के कुछ वर्गों ने बैरिकेड्स की कई परतों को नहीं तोड़ा और संसद की ओर बढ़ने का प्रयास नहीं किया।

पुलिस का दावा है कि स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण थी। लगभग 5000 पुलिसकर्मियों को 3 किलोमीटर में फैले 30,000 से अधिक लोगों की भीड़ को नियंत्रित करना था। पुलिस के अनुसार, जब भीड़ नियंत्रण से बाहर हो गई, तो संघर्ष अपरिहार्य हो गया, जिसमें 240 से अधिक पुलिसकर्मी और लगभग 200 प्रदर्शनकारी घायल हुए। दिल्ली पुलिस ने अपने हलफनामे में जोर देकर कहा है कि चूँकि संसद मार्च के लिए कोई अनुमति नहीं दी गई थी, इसलिए यह जमावड़ा गैर-कानूनी था।

पुलिस ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों की भारी संख्या के बीच असामाजिक तत्वों और हिस्ट्रीशीटरों ने घुसपैठ कर ली थी। पुलिस के अनुसार, अत्यधिक बल का आरोप टिकाऊ नहीं है, क्योंकि वे केवल कानून का पालन करने वाली एक गैर-कानूनी भीड़ को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहे थे। अजीब हालत है कि दिल्ली पुलिस की इन दलीलों को केंद्रीय मंत्री किरेण रिजिजू सही ठहरा रहे हैं।

सोशल मीडिया और मीडिया रिपोर्टों में पुलिस पर लगे आरोपों का खंडन करते हुए, दिल्ली पुलिस ने कहा है कि याचिकाएं चुनिंदा तस्वीरों और असत्यापित वीडियो पर आधारित हैं। पुलिस का कहना है कि ये क्लिप्स एकतरफा तस्वीर पेश करती हैं। कील वाली लाठी के आरोपों पर पुलिस ने स्पष्ट किया कि वायरल वीडियो में जो लाठी दिख रही है, वह पुलिस की नहीं बल्कि एक प्रदर्शनकारी के हाथ में थी, जिस पर राष्ट्रीय ध्वज लगा हुआ था।

सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी के उपयोग को लेकर उठ रहे सवालों पर पुलिस ने कहा कि यह कोई नई या अवैध रणनीति नहीं है। भीड़ नियंत्रण के लिए विशेष शाखा और अपराध शाखा के अधिकारियों का भीड़ में शामिल होना एक रणनीतिक कदम है, जिसका उपयोग स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे अवसरों पर भी किया जाता है। पुलिस ने दावा किया कि उनके अधिकारी तब मजबूर हुए जब प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड्स तोड़कर पुलिस पर हमला करना शुरू कर दिया। इस हलफनामे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा विरोध स्थल पर फेसियल रिकग्निशन सॉफ्टवेयर का उपयोग है।

पुलिस ने इसे आनुपातिक पुलिसिंग उपाय बताया है। पुलिस का तर्क है कि यह सॉफ्टवेयर किसी भी व्यक्ति की निजी जानकारी के लिए निगरानी नहीं करता है, बल्कि इसका उपयोग केवल उन लोगों की पहचान के लिए किया जाता है जिनका पहले से गंभीर अपराधों का रिकॉर्ड रहा है। स्पष्ट किया गया है कि किसी भी कार्रवाई का आधार केवल सॉफ्टवेयर नहीं है, बल्कि उसके बाद एक फील्ड वेरिफिकेशन भी किया जाता है।

दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया है कि वे अदालत द्वारा गठित की जाने वाली समिति के साथ सहयोग करने के लिए तैयार हैं। हलफनामे में यह भी उल्लेख किया गया है कि प्रदर्शन के दौरान करीब 2873 लोगों के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, डकैती और पोक्सो जैसे गंभीर धाराओं में मामले दर्ज हैं, जिनकी जांच एसआईटी करेगी। यह मामला लोकतांत्रिक अधिकारों और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच के नाजुक संतुलन को रेखांकित करता है। जहाँ एक ओर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनिवार्य है, वहीं दूसरी ओर कानून का शासन सुनिश्चित करना राज्य का उत्तरदायित्व है।

सुप्रीम कोर्ट में चल रही यह सुनवाई भविष्य के लिए विरोध प्रदर्शनों के प्रबंधन हेतु नए मानक तय कर सकती है। हास्यास्पद स्थिति यह है कि यह सारी दलीलें तब दी जाने वाली है जब संसद के मॉनसूत्र सत्र में अमित शाह सदन के भीतर इस बात के लिए कोई जानकारी देने तक नहीं आये। सिर्फ अंतिम दिन वंदेमातरम गीत के दौरान उनका दर्शन पूरे देश को हुआ और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने तत्काल सभा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने का एलान कर दिया। इससे माना जाए कि हम सभी अपनी आंखों से और सोशल मीडिया पर जो कुछ देख रहे थे, उसे यह सरकार अब भी झूठ साबित करने पर तुली हुई है।