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इस दशक में सबसे कम मॉनसून की बारिश

भारतीय कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती

करीब 12 फीसद से अधिक की कमी

वैश्विक जलवायु परिवर्तन का असर है

कई फसलों की बुआई पर असर पड़ा है

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून को लेकर एक बेहद चिंताजनक और गंभीर आंकड़ा सामने आया है। हाल ही में जारी मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष भारत में एक दशक से भी अधिक समय यानी पिछले दस वर्षों में सबसे कमजोर मानसून दर्ज किया गया है।

देश भर में इस सीजन में कुल मानसूनी वर्षा दीर्घकालिक औसत से 12.6 प्रतिशत नीचे रही है। इस भारी कमी ने न केवल देश के जल संसाधनों पर दबाव बढ़ा दिया है, बल्कि कृषि उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर भी एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।

मौसम विज्ञानियों और कृषि विशेषज्ञों के विश्लेषण के अनुसार, मानसून के इस कमजोर प्रदर्शन के पीछे अल नीनो प्रभाव, हिंद महासागर द्विध्रुव की स्थिति और बदलते वैश्विक जलवायु पैटर्न जैसी कई प्रमुख वजहें जिम्मेदार रहीं। देश के कई राज्यों में मानसून का आगमन या तो बहुत देर से हुआ या फिर उसकी सक्रियता बेहद सुस्त रही।

उत्तर-पश्चिम, मध्य और प्रायद्वीपीय भारत के कई हिस्सों में तय समय से काफी कम बारिश हुई, जिसके कारण कई जिलों में सूखे जैसे हालात और भूजल स्तर में भारी गिरावट देखने को मिली। धान, दलहन और तिलहन जैसी खरीफ की मुख्य फसलों की बुआई और उनके विकास पर इस कम बारिश का सबसे बुरा असर पड़ा है।

खेती-किसानी के मोर्चे पर इस कमजोर मानसून के दूरगामी और गंभीर परिणाम हो सकते हैं। देश के करोड़ों किसान जो अपनी सिंचाई आवश्यकताओं के लिए सीधे तौर पर मानसूनी बारिश पर निर्भर रहते हैं, उन्हें भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

कई क्षेत्रों में भूजल स्तर नीचे चले जाने के कारण नलकूपों और बोरवेलों ने भी काम करना बंद कर दिया है, जिससे किसानों को महंगे दामों पर टैंकरों से पानी खरीदना पड़ रहा है। इसके अलावा, जलाशयों और बांधों में पानी का स्तर सामान्य से काफी नीचे चला गया है, जिसका असर आने वाले रबी सीजन की फसलों की सिंचाई और शहरी क्षेत्रों में पीने के पानी की आपूर्ति पर भी पड़ना तय माना जा रहा है।

सरकार और नीति निर्माताओं के लिए यह स्थिति एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। खाद्य सुरक्षा और महंगाई नियंत्रण को लेकर भी चिंताएं बढ़ने लगी हैं, क्योंकि फसलों के उत्पादन में कमी आने से दालों, अनाजों और सब्जियों के बाजार भाव में तेजी आ सकती है।

कृषि विशेषज्ञों का सुझाव है कि केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर तुरंत दीर्घकालिक जल संरक्षण योजनाओं, ड्रिप इरिगेशन और सूखा-प्रतिरोधी बीज तकनीकों को बढ़ावा देना चाहिए। इसके साथ ही, प्रभावित किसानों के लिए राहत पैकेजों और ऋण पुनर्गठन की व्यवस्था करना अनिवार्य हो गया है ताकि वे इस प्राकृतिक आपदा के दौर से उबर सकें।