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देश में आर्थिक असमानता की खाई लगातार बढ़ रही

मोदी सरकार के तमाम दावों के बीच ही अब जमीनी सच्चाई का खुलासा सरकारी एजेंसियों और सरकारी आंकड़ों से होने लगा है। पहले विपक्ष यह आरोप लगाता रहा है कि यह सरकार सिर्फ चंद पूंजीपतियों के हितों का ख्याल रखती है। इसी वजह से देश की आम जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा भी इन्हीं पूंजीपतियों पर लूटाया जाता रहा है।

दूसरी तरफ सरकार इन आरोपों का खंडन करते हुए देश की आर्थिक स्थिति में हो रहे सुधार का दावा करती रही है। कोरोना महामारी और लॉकडाउन के पहले से ही देश का आम आदमी नोटबंदी और जीएसटी की परेशानियों से जूझ रहा था। कारोबार बंद होने की वजह से जो पैसा लोगों की बचत से टूटा है, उसकी भरपाई नहीं हो पा रही है। दूसरी तरफ सरकार लगातार आर्थिक तरक्की के दावों के बीच जीएसटी संग्रह में लगातार हो रही बढ़ोत्तरी का दावा कर रही है।

इस क्रम में देश का निर्यात घटने और आयात बढ़ने की वजह से विदेशी पूंजी भंडार में कमी तथा डॉलर की कीमतों में निरंतर बढ़ोत्तरी के बारे में देश के वित्त मंत्री ने विदेश में ऐसा बयान दिया है कि देश की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जगहंसाई हो चुकी है। इसके बाद भी चुनावी माहौल में सरकार जनता के बीच से उठ रहे सवालों के भाग रही है, यह साफ होता जा रहा है। दूसरी तरफ सर्वेक्षण के आंकड़े बता रहे हैं कि वित्तीय समावेशन की दिशा में मजबूत प्रगति और वित्तीय सेवा उद्योग के विस्तार के बावजूद देश के करीब 69 प्रतिशत परिवार अपनी वित्तीय असुरक्षा और कमजोरी का सामना कर रहे हैं।

सर्वेक्षण पर आधारित रिपोर्ट में यह दावा किया गया। आर्थिक खबरों के डिजिटल मंच की तरफ से व्यक्तिगत वित्त के बारे में कराए एक सर्वेक्षण के आधार पर यह रिपोर्ट जारी की गई है। इस सर्वेक्षण में भारतीय परिवारों की आय, बचत, निवेश एवं खर्च से जुड़े बिंदुओं को समेटने की कोशिश की गई है। इस सर्वेक्षण के आधार पर परिवारों की आमदनी, खर्च एवं बचत के तौर-तरीकों को समझने के लिए देश की पहली नागरिक वित्तीय सुरक्षा रैंकिंग भी जारी की गई है।

इस रिपोर्ट के मुताबिक देश में 4.2 सदस्यों वाले एक परिवार की औसत आय 23,000 रुपये प्रति माह है। वहीं 46 प्रतिशत से अधिक परिवारों की औसत आय 15,000 रुपये प्रति माह से भी कम है। इसका मतलब है कि ये परिवार आकांक्षी या निम्न आय समूह से ताल्लुक रखते हैं। यह सर्वेक्षण रिपोर्ट कहती है कि देश के सिर्फ तीन प्रतिशत परिवारों का ही जीवन-स्तर विलासिता से भरपूर है और उनमें में अधिकतर परिवार उच्च आय वर्ग से संबंधित हैं। इस सर्वेक्षण में पाया गया कि करीब 70 प्रतिशत परिवार बैंक जमा, बीमा, डाकघर बचत और सोने के रूप में अपनी वित्तीय बचत करते हैं।

इनमें भी उनका सबसे ज्यादा जोर बैंकों एवं डाकघरों पर होता है और जीवन बीमा एवं सोना का स्थान उसके बाद आता है। भारतीय परिवारों की बचत का 64 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बैंक खातों में जमा के रूप में है जबकि सिर्फ 19 प्रतिशत परिवारों को ही बीमा की सुरक्षा हासिल है। मई और सितंबर के बीच कराए गए इस देशव्यापी सर्वेक्षण में 20 राज्यों के 31,510 परिवारों से बात की गई। इस दौरान शहरी इलाकों के अलावा ग्रामीण परिवारों से भी चर्चा की गई।

यह सर्वेक्षण गुणवत्तापरक वित्तीय आंकड़ों की दिशा में एक बड़ी खाई को पाटने की कोशिश है। इसमें भारतीय परिवारों की व्यक्तिगत वित्तीय जरूरतों पर विशेष ध्यान दिया गया है। इस सर्वेक्षण से वित्तीय सुरक्षा के बारे में कुछ अनूठे एवं मूल्यवान आंकड़े सामने आने की उम्मीद है जिसका इस्तेमाल नीति-निर्माता नागरिकों के लिए नीतियां बनाने में कर सकते हैं। दूसरी तरफ देश में एक और रिपोर्ट भी आयी है, जिसमें कहा गया है कि दीपावली के मौके पर देश के बाजार से करीब साढ़े सात हजार करोड़ रुपये गायब हो गये थे।

पहले तो यह दलील दी गयी थी कि भीड़ से बचने के लिए लोगों ने इस बार ऑनलाइन खरीद पर ज्यादा खर्च किये हैं लेकिन इस दलील का दूसरे हिस्से का उत्तर नहीं मिल पाया कि आखिर ऑनलाइन खरीद के लिए लोगों के बैंक खातों में जमा रकम का तो हिसाब मौजूद था। फिर इतनी अधिक मात्रा में नकदी किन तिजोरियों में कैद है, इसका संतोषजनक उत्तर नहीं मिल पाया है। इससे साफ है कि देश में वाकई अमीरों और गरीबों के बीच की खाई बहुत बढ़ी है और आम जनता की बढ़ती परेशानियों की एक वजह सरकार द्वारा अमीरों के हित में लिये गये फैसले भी हैं। इन फैसलों में कर्जमाफी का फैसला भी शामिल है। दो राज्यों में होने वाले चुनावों से अलग राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में अमीरी और गरीबी के बीच की खाई का बार बार उल्लेख भी जनता को अब इस बारे में सोचने पर मजबूर कर रहा है।