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क्या सुप्रीम कोर्ट अपना पुराना वादा भूल गया

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026 को तमिलनाडु की एक महिला की उस याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसका नाम विशेष गहन संशोधन की प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटा दिया गया था। सुनवाई के अंतिम क्षणों में, याचिकाकर्ता के वकील ने न्यायालय को उसके उस पुराने वादे की याद दिलाई जिसमें कोर्ट ने कहा था कि यदि एसआईआर की प्रक्रिया से देश भर में सामूहिक निष्कासन की स्थिति बनती है, तो न्यायपालिका इसमें हस्तक्षेप करेगी।

याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में कहा कि उनका नाम पिछले कई वर्षों से राज्य की मतदाता सूची का स्थायी हिस्सा रहा है। उनकी योजना तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 में 51-उथंगराई (एस सी) और 52-बरगुर विधानसभा क्षेत्रों से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने की थी।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष पेश होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल संकरनारायणन और अधिवक्ता शशांक मनीष ने तर्क दिया कि चुनाव आयोग द्वारा सुश्री गीता को नाम हटाने के संबंध में कोई पूर्व नोटिस नहीं दिया गया था। उन्हें इस निष्कासन के बारे में तब पता चला जब वे अपना नामांकन पत्र दाखिल करने गईं। याचिकाकर्ता को इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि उनका नाम हटाया जा रहा है क्योंकि उन्हें कभी कोई नोटिस नहीं दिया गया।

इसके अलावा, न तो उन्हें सुनवाई का अवसर दिया गया और न ही कोई आधिकारिक संचार भेजा गया। इस प्रकार, याचिकाकर्ता की जानकारी के बिना उनका नाम हटाना संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत गारंटीकृत प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है। मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद सुश्री गीता ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था। वरिष्ठ वकील संकरनारायणन ने तर्क दिया कि यद्यपि नामांकन की तारीख समाप्त हो गई है, लेकिन पूरक सूची अभी भी तैयार की जा रही है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि उनकी मुवक्किल के पास भारतीय पासपोर्ट सहित व्यापक दस्तावेजी सबूत हैं, जो उनकी नागरिकता सिद्ध करते हैं। संकरनारायणन ने अदालत से कहा, हम गलत तरीके से हटाए गए नाम को बहाल करने और उनकी मूल चुनावी स्थिति को वापस पाने की मांग कर रहे हैं। नाम का अचानक हटना न केवल गलत, मनमाना और कानून के विपरीत है, बल्कि उनके मौलिक अधिकारों का भी घोर उल्लंघन है।

उन्होंने चुनाव आयोग की मंशा पर सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिर आयोग लोगों को उनके मतदान के अधिकार से बाहर क्यों करना चाहता है, जबकि व्यक्ति के पास 15 वर्षों के प्रमाण और वैध पासपोर्ट मौजूद है। भारत निर्वाचन आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू ने जवाबी तर्क देते हुए कहा कि अब बहुत देर हो चुकी है।

चुनाव प्रक्रिया अपने उन्नत चरण में है और इस समय सूची में बदलाव करना तकनीकी रूप से जटिल है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस बात पर गौर किया कि एसआईआर की अंतिम सूची फरवरी में ही जारी कर दी गई थी। उन्होंने याचिकाकर्ता से पूछा कि उन्होंने इस निष्कासन के खिलाफ आपत्ति दर्ज कराने या अपील करने में इतनी देरी क्यों की?

इसके जवाब में संकरनारायणन ने पुनः दोहराया कि उनकी मुवक्किल को कभी कोई नोटिस मिला ही नहीं, जिससे उन्हें कार्रवाई का पता चलता। जब पीठ ने मामले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया, तो वकील संकरनारायणन ने पीठ के एक अन्य सदस्य, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची के पुराने शब्दों का संदर्भ दिया। उन्होंने याद दिलाया कि जस्टिस बागची ने एक पूर्व सुनवाई में कहा था कि यदि सामूहिक निष्कासन होता है, तो नागरिकों को सुरक्षा प्रदान की जाएगी।

संकरनारायणन ने भावुक होते हुए कहा, अब यही (सामूहिक निष्कासन) हो रहा है। इस पर चुनाव आयोग के वकील श्री नायडू ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, कोई व्यक्ति महीनों तक सोता रहता है और अब सामूहिक निष्कासन का दावा करता है। ये राजनीतिक भाषण हैं, कानूनी भाषण नहीं।

सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप न करने का यह निर्णय उन हजारों मतदाताओं के लिए एक मिसाल बन सकता है जिनके नाम हालिया मतदाता सूची संशोधन (एसआईआर) के दौरान हटाए गए हैं। यही हाल पश्चिम बंगाल का भी है। जहां के बारे में बार बार ध्यान आकृष्ट किये जाने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग दोनों ने इन गलतियों को सुधारने की दिशा में अपनी तरफ से कोई सक्रियता नहीं दिखाई और लाखों लोगों को उनके संवैधानिक अधिकार से वंचित होने का रास्ता साफ कर दिया। यह सभी के लिए शीर्ष अदालत के उसी पूर्व वादे को याद करने का समय है, जिसमें सामूहिक निष्कासन नहीं होने देने की बात कही गयी थी।