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लोकतंत्र में सफेद मोतियाबिंद और चयनात्मक न्याय

आजकल देश में लोकतंत्र की आँखों पर पट्टी नहीं, बल्कि स्मार्ट चश्मा चढ़ा हुआ है। यह चश्मा इतना आधुनिक है कि इसे वही दिखता है जो सिस्टम दिखाना चाहता है। आजकल मतदाता सूचियों का शुद्धिकरण चल रहा है। शुद्धिकरण भी ऐसा कि लाखों नाम ऐसे गायब हो रहे हैं जैसे चुनाव के बाद नेताओं के वादे।

तमिलनाडु से लेकर पश्चिम बंगाल तक, हजारों मतदाता अपनी नागरिकता के प्रमाण लेकर सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर खड़े हैं, लेकिन जवाब मिलता है— देर हो गई है, सो गए थे क्या? शायद मतदाता को यह नहीं पता कि लोकतंत्र में वोट देने का अधिकार कन्फर्म टिकट नहीं, बल्कि वेटिंग लिस्ट है, जो कभी भी चार्ट बनने से पहले काटी जा सकती है।

उधर, भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का आलम यह है कि यह किसी खास वॉशिंग मशीन के ब्रांड की तरह काम कर रहा है। आबकारी नीति के मामले में न्याय की रफ्तार बुलेट ट्रेन जैसी है—गिरफ्तारी से लेकर सुनवाई तक सब कुछ सुपरफास्ट। लेकिन जैसे ही सुई असम की ओर मुड़ती है, जहाँ मुख्यमंत्री की पत्नी पर विदेशी संपत्तियों और चुनावी हलफनामे में जानकारी छिपाने के आरोप लगते हैं, तो सिस्टम को अचानक सफेद मोतियाबिंद हो जाता है।

असम के मुख्यमंत्री इतने कॉन्फिडेंट हैं कि वे अपने विरोधियों को गीता पर हाथ रखने की चुनौती दे रहे हैं, लेकिन जब चुनाव आयोग में शिकायत पहुँचती है, तो फाइलें फाइलों के नीचे ऐसे दब जाती हैं जैसे सरकारी दफ्तर में लंच ब्रेक के बाद कर्मचारी। यहाँ न्याय अंधा नहीं, बल्कि रंग अंधा हो गया है। उसे केवल वही रंग दिखता है जो सत्ता के झंडे में सबसे ऊपर है। यह व्यवस्था एक ऐसी प्रयोगशाला बन गई है जहाँ विपक्ष के आरोपों पर एसिड टेस्ट होता है और सत्ता पक्ष के दावों पर परफ्यूम छिड़का जाता है।

जब कानून की तराजू के एक पलड़े में पवन खेड़ा जैसे लोगों पर तुरंत कार्रवाई का वजन हो और दूसरे पलड़े में मौन सहमति की रुई, तब दिल से बस एक ही धुन निकलती है जो दशकों पहले हमारे सिनेमाई पर्दे पर गूँजी थी। यह गीत आज के भारत की न्यायिक और राजनीतिक विसंगतियों पर सबसे सटीक बैठता है। इस गीत को लिखा था आनंद बक्षी ने और संगीत में ढाला था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने। इसे किशोर कुमार ने अपना स्वर प्रदान किया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

ये अंधा कानून है, ये अंधा कानून है ये अंधा कानून है, ये अंधा कानून है

जाने कहाँ दग़ा दे-दे जाने किसे सज़ा दे-दे

साथ न दे कमज़ोरों का ये साथी है चोरों का

बातों और दलीलों का ये खेल वक़ीलों का

ये इन्साफ़ नहीं करता किसी को माफ़ नहीं करता

माफ़ इसे हर ख़ून है

ये अन्धा क़ानून है …

लोग अगर इससे डरते मुजरिम जुर्म न करते

यह माल लुटेरे लूट गए रिश्वत देकर छूट गए

अस्मतें लुटीं चली गोली इसने आँख नहीं खोली

काला धन्धा होता रहा ये कुर्सी पर सोता रहा

दुनिया की इमारत का कच्चा इक सुतून है

ये अन्धा क़ानून है …

लम्बे इसके हाथ सही ताक़त इसके साथ सही

पर ये देख नहीं सकता ये बिन देखे है लिखता

जेल में कितने लोग सड़े सूली पर निर्दोष चढ़े -२

मैं भी इसका मारा हूं पागल हूँ आवारा हूँ

यारों मुझको होश नहीं सर मेरे जुनून है

ये अन्धा क़ानून है

विडंबना देखिए कि 1983 के ये बोल आज 2026 में भी उतने ही ताज़ा लग रहे हैं। जब मतदाता सूची से गायब होते नाम और सत्ता के करीबियों पर मौन साधे बैठी जाँच एजेंसियाँ एक साथ दिखती हैं, तो समझ आता है कि कानून वास्तव में अंधा नहीं है, उसे बस सुविधाजनक दृष्टिबाधिता की बीमारी हो गई है।

एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश तो राज्यसभा में बिना किसी सक्रियता के छह साल बाद आराम से रिटायर हो गये। अब हमलोग यानी देश का मैंगो मैन अपनी जेब से उनके दोनों रिटायरमेंट की पेशन भरता रहेगा। भला हमलोग भी एक तमाम ऐसे लोगों के लिए सिर्फ एक पेंशन और वह भी सबसे कम वाली की मांग क्यों नहीं कर सकते।

आखिर हर साल इसी मद में अरबों खर्च हो रहे हैं और उसका कोई लाभ तो जनता को मिल नहीं रहा है। अनेक लोग तो सिर्फ संसद और अदालतों के एयरकंडिशंड कमरों का आनंद उठाने आये हैं। जब अपनी बारी आती है तो अचानक माई लॉर्ड लोग स्वतः संज्ञान लेकर मामला चालू कर देते हैं। अब हिमंता की विदेशी संपत्ति की बात सामने आयी तो सोशल मीडिया में दस्तावेज चल रहे हैं, जो सच हैं या नहीं, पता नहीं। वोटर नाम दर्ज कराने धक्के खा रहा है और जनता के पैसे से चंद लोग देश में ऐश कर रहे हैं। यह वाकई अंधा कानून ही है।