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झारखंड की राजनीति में दरार: जेएमएम और कांग्रेस के रिश्तों में कड़वाहट

गठबंधन की सरकार में अविश्वास का साया

  • असम में जेएमएम को चुनाव चिह्न

  • भाजपा-चुनाव आयोग की मिलीभगत

  • असम में कांग्रेस को वोट कटवा का डर

राष्ट्रीय खबर

रांचीः  झारखंड में सत्ता साझा कर रहे झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और कांग्रेस के बीच के संबंध वर्तमान में अपने सबसे खराब दौर से गुजर रहे हैं। हालांकि दोनों दल राज्य की सत्ता में साथ हैं, लेकिन हाल ही में संपन्न हुए असम विधानसभा चुनावों ने इनके बीच अविश्वास की एक गहरी खाई खोद दी है। यह कड़वाहट अब केवल बंद कमरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सार्वजनिक मंचों और सरकार के कामकाज में भी दूरी के रूप में नजर आने लगी है।

असम का सिंबल विवाद और संदेह की सुई इस विवाद की मुख्य जड़ असम में झामुमो की चुनावी दावेदारी है। कांग्रेस नेतृत्व इस बात को लेकर हैरान और आशंकित है कि जिस राज्य में झामुमो की कोई खास राजनीतिक उपस्थिति नहीं है, वहां उसे इतनी सुगमता से अपना चुनाव चिह्न कैसे आवंटित हो गया। कांग्रेस के भीतर यह चर्चा तेज है कि यह चुनाव आयोग और भाजपा के बीच किसी गुप्त रणनीति का हिस्सा हो सकता है, ताकि विपक्षी वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सके। कांग्रेस इसे फ्रेंडली फाइट के बजाय एक सोची-समझी साजिश के रूप में देख रही है।

असम के चाय बागानों और आदिवासी बहुल इलाकों में झारखंड से गए आदिवासियों की बड़ी आबादी है। कांग्रेस का आरोप है कि जेएमएम ने वहां चुनाव लड़कर सीधे तौर पर कांग्रेस के वोट काटे, जिससे अंततः भाजपा को बढ़त मिली। कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि जेएमएम की इस महत्वाकांक्षा ने असम में भाजपा विरोधी मोर्चे को कमजोर किया है। इसी का नतीजा है कि झारखंड की सत्ता में साथ होने के बावजूद दोनों दलों के नेता एक-दूसरे के कार्यक्रमों से किनारा कर रहे हैं।

झारखंड में सरकार के भविष्य पर चर्चा सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि राजनीतिक गलियारों में अब बिना कांग्रेस के सहयोग के भी झारखंड सरकार चलाने की संभावनाओं पर चर्चा शुरू हो गई है। सूत्रों के अनुसार, जेएमएम के कुछ धड़े यह मानकर चल रहे हैं कि वे अन्य छोटे दलों या निर्दलीयों के सहारे अपनी स्थिति मजबूत कर सकते हैं। वहीं, कांग्रेस भी अपनी उपेक्षा से नाराज होकर अब एकला चलो की रणनीति पर विचार कर रही है।

झारखंड का यह गठबंधन फिलहाल मजबूरी की शादी जैसा नजर आ रहा है। यदि दोनों दलों ने जल्द ही संवाद के जरिए इन मतभेदों को नहीं सुलझाया, तो राज्य की राजनीति में किसी बड़े उलटफेर की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।