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नेशन वांट्स टू नो, मेरे सवालों का जवाब दो

आजकल टीवी खोलो या अखबार, एक ही शोर सुनाई देता है—देश जवाब मांग रहा है! ऐसा लगता है कि देश कोई कड़ाके की परीक्षा दे रहा है, जहां सवाल आउट ऑफ सिलेबस आ गए हैं। पर चिंता की कोई बात नहीं है। हमारे सिस्टम के पास हर सवाल का एक ही बेहद संतोषजनक जवाब है—कृपया कतार में रहें, आपका सवाल हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

जनता का पहला और सबसे पुराना सवाल है—हुजूर, ये महंगाई और पेट्रोल-डीजल के दाम रॉकेट बनकर अंतरिक्ष की सैर क्यों कर रहे हैं? अब जनता ठहरी नासमझ। वह अर्थशास्त्र नहीं समझती। सरकार का नजरिया इसमें बेहद दूरदर्शी है। पेट्रोल के दाम इसलिए बढ़ाए जा रहे हैं ताकि आप गाड़ी कम चलाएं। गाड़ी कम चलेगी, तो प्रदूषण कम होगा। प्रदूषण कम होगा, तो फेफड़े साफ रहेंगे। यानी बढ़े हुए दाम असल में एक हेल्थ प्रीमियम हैं, जो सरकार आपकी भलाई के लिए वसूल रही है। रही बात महंगाई की, तो जब जेब में पैसे ही नहीं बचेंगे, तो फास्ट फूड और बाहर का खाना खुद-ब-खुद बंद हो जाएगा। इसे कहते हैं आर्थिक योग। जनता को तो इस मास्टरस्ट्रोक के लिए धन्यवाद देना चाहिए, पर वो है कि हर बात में मीन-मेख निकालती है।

दूसरा तीखा सवाल देश के भविष्य, यानी छात्रों की तरफ से आ रहा है। नीट-यूजी परीक्षा के पेपर लीक को लेकर छात्र सड़कों पर हैं। वे पूछ रहे हैं कि इतनी सुरक्षा के बाद भी पेपर व्हाट्सएप पर पहले कैसे तैरने लगता है? देखा जाए तो इसे लीक कहना ही गलत है। यह तो शिक्षा का लोकतांत्रिकरण है! जब परीक्षा से पहले ही सवाल सबको मिल जाएंगे, तो सबका साथ, सबका विकास का नारा सच साबित होगा। जो छात्र साल भर कमरों में बंद होकर रट्टा मार रहे थे, उन्हें यह समझना चाहिए कि असली मैनेजमेंट स्किल तो वह है जो परीक्षा से ठीक एक रात पहले पेपर का जुगाड़ कर ले। सिस्टम तो छात्रों को आत्मनिर्भर बना रहा है, पर छात्र हैं कि आज भी पुरानी किताबों में सिर खपाना चाहते हैं।

इधर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता पहुंचे हुए हैं। उनका सवाल है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर कुछ धुंध क्यों दिखाई दे रही है? वह कुछ मामलों में इतनी धीमी गति के समाचार जैसा व्यवहार क्यों करता है? अब इस पर सवाल उठाना सरासर नाइंसाफी है। निष्पक्षता का मतलब यह थोड़ी है कि आप हर किसी पर एक जैसी नजर रखें। समानता और समभाव में फर्क होता है। आयोग अगर किसी की तरफ देखकर मुस्कुरा देता है या किसी की गलती पर आंखें मूंद लेता है, तो इसे उसकी महानता और सहनशीलता समझा जाना चाहिए, निष्पक्षता पर शक नहीं। वैसे भी, जो जीतता है, सिकंदर वही कहलाता है; अब सिकंदर की शर्ट पर दाग ढूंढना तो इतिहासकारों का काम है, चुनाव आयोग का नहीं।

इसी बात पर एक पुराना गीत याद आ रहा है। फिल्म मैने प्यार किया के इस गीत कोलिखा था असस भोपाली ने और संगीत में ढाला था राम लक्ष्मण ने। इसे एस पी बालासुब्रमणियम ने अपना स्वर दिया था। गीत को बोल कुछ इस तरह हैं

मेरे रंग में रंगने वाली

परी हो या हो परियों की रानी

या हो मेरी प्रेम कहानी

मेरे सवालों का जवाब दो, दो न

बोलो न क्यों ये चाँद सितारे

तकते हैं यूँ मुखड़े को तुम्हारे

छूके बदन को हवा क्यों महकी

रात भी है क्यों बहकी बहकी

मेरे सवालों का जवाब दो   …

क्यों हो तुम शरमाई हुई सी

लगती हो कुछ घबराई हुई सी

ढलका हुआ सा आँचल क्यों है

ये मेरे दिल में हलचल क्यों है

मेरे सवालों का जवाब दो   …

दोनो तरफ़ बेनाम सी उलझन

जैसे मिले हो दुल्हा-दुल्हन

दोनो की ऐसी हालत क्यों है

आखिर इतनी मुहब्बत क्यों है

मेरे सवालों का, जवाब दो   …

आखिरी और सबसे ताजा सवाल राहुल गांधी के उस सुझाव के बाद आया है, जिसमें उन्होंने आम जनता के खर्चे कम करने की बात की थी। अब जनता मोदी जी से पूछ रही है कि इस पर अमल करने में इतनी देरी क्यों हो रही है? जनता को समझना होगा कि खर्च कम करने की कोई भी योजना इतनी जल्दी लागू नहीं की जा सकती। अपना खर्च कम किया तो है कि काफिले की गाड़ियों कम कर दी हैं। अब वेतन,पेंशन छोड़ने की बात नेताओं और अफसरों से मत करना। देश सवाल का उत्तर मांग रहा है, और सिस्टम मुस्कुरा रहा है। क्योंकि सिस्टम जानता है कि सवाल चाहे जो भी हो, कुछ दिनों बाद एक नया ट्रेंड आएगा, एक नया मैच शुरू होगा, और जनता पुराने सवाल भूलकर नए सवालों की कतार में लग जाएगी। तब तक के लिए, डिजिटल इंडिया में डिजिटल जवाबों का आनंद लीजिए!