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ब्लैकलिस्ट किये गये शिक्षाविद सुप्रीम कोर्ट पहुंचे

एनसीईआरटी की पुस्तक पर प्रतिबंध के बाद विवाद जारी

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः भारतीय न्यायपालिका और शिक्षा जगत के बीच उपजा हालिया विवाद अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया है। एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार पर एक अध्याय लिखने के कारण ब्लैकलिस्ट किए गए तीन शिक्षाविदों ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।

प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार ने अपने वकीलों के माध्यम से न्यायालय से अनुरोध किया है कि उनके खिलाफ कोई भी स्थायी आदेश पारित करने से पहले उन्हें अपनी बात रखने का उचित अवसर दिया जाए। इन शिक्षाविदों ने व्यक्तिगत हलफनामा दायर कर उस संदर्भ और मंशा को स्पष्ट करने की कोशिश की है, जिसके तहत उन्होंने संबंधित अध्याय की रचना की थी।

इस मामले की पृष्ठभूमि 26 मार्च 2026 की है, जब उच्चतम न्यायालय ने एक कड़ा रुख अपनाते हुए इन तीनों विशेषज्ञों को भविष्य में सार्वजनिक संस्थानों की किसी भी शैक्षणिक परियोजना से जुड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया था। न्यायालय ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि इन शिक्षाविदों के पास या तो भारतीय न्यायपालिका के बारे में पर्याप्त और सटीक जानकारी का अभाव है, या फिर उन्होंने जानबूझकर तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है। अदालत का मानना था कि कक्षा 8 के किशोर छात्रों के मन में न्यायपालिका की एक नकारात्मक छवि गढ़ने की कोशिश की गई है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए हानिकारक हो सकती है।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि शैक्षणिक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि बिना किसी ठोस आधार के संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाई जाए। इस आदेश के बाद से ही शिक्षा जगत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम संस्थानों की गरिमा पर एक नई बहस छिड़ गई है।

शिक्षाविदों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी कि उनके मुवक्किलों को अपना पक्ष रखने का मौका दिए बिना ही दोषी मान लिया गया और उन पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है। दायर किए गए हलफनामों में यह तर्क दिया गया है कि अध्याय का उद्देश्य छात्रों को न्यायिक सुधारों की आवश्यकता और व्यवस्था में मौजूद चुनौतियों के प्रति जागरूक करना था, न कि किसी संस्था की छवि धूमिल करना। उन्होंने स्पष्ट किया कि अध्याय में दी गई जानकारी सार्वजनिक डोमेन में मौजूद रिपोर्टों और डेटा पर आधारित थी।

अब मुख्य प्रश्न यह है कि क्या उच्चतम न्यायालय अपने पिछले आदेश पर पुनर्विचार करेगा और इन विशेषज्ञों को विस्तृत सुनवाई का अवसर प्रदान करेगा। यह मामला न केवल इन तीन व्यक्तियों के करियर के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भारत में पाठ्यपुस्तकों के लेखन और उसमें आलोचनात्मक सोच को शामिल करने की सीमाएं भी तय करेगा। फिलहाल, न्यायालय ने हलफनामों को रिकॉर्ड पर ले लिया है और अगली सुनवाई के लिए तारीख तय की जा सकती है।