Breaking News in Hindi

तृणमूल के बागियों का विलय नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी में

अज्ञात राजनीतिक दल का कार्यालय एक एनजीओ का दफ्तर है

  • भाजपा में विलय की योजना अधर में लटकी

  • पर्याप्त संख्याबल नहीं कानून की अड़चन

  • त्रिपुरा में चुनाव लड़ा था इस पार्टी ने

राष्ट्रीय खबर

कोलकाताः तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों का नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी नामक एक अज्ञात राजनीतिक दल में विलय होना सबको चौंका रहा है। इंटरनेट पर भी इस दल के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन ममता बनर्जी के खिलाफ बगावत करने वाले कम से कम 20 सांसदों के लिए यह एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।

कानूनी जानकारों का मानना है कि बागी गुट दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए यह रास्ता अपना रहा है। यदि वे सीधे तौर पर दूसरी पार्टी में जाते, तो उनकी सदस्यता खतरे में पड़ सकती थी। इस विलय ने उन्हें एक तरफ कानूनी झंझटों से बचाया है, तो दूसरी तरफ उन्हें संगठित होने का समय भी दिया है। अब उनका मुख्य लक्ष्य ममता बनर्जी से पार्टी का नाम और पहचान छीनकर खुद को असली तृणमूल साबित करना है। लेकिन इस चर्चा में आय़ी पार्टी का कोई खास अस्तित्व नहीं हैं और अब पता चला है कि इसका कार्यालय एक एनजीओ के दफ्तर से संचालित होता है। इस पार्टी ने त्रिपुराके चुनाव में भी भाग लिया था पर बुरी तरह फ्लॉप रही।

इस पूरी बगावत में भाजपा की भूमिका स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। सुदीप बंदोपाध्याय का केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और अन्य भाजपा नेताओं से मिलना, तथा बागी सांसदों का केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर इकट्ठा होना, किसी बड़े गठबंधन की ओर इशारा करता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मानसून सत्र में केंद्र सरकार कुछ महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन बिल पेश करने वाली है, जिसके लिए उन्हें दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता है। इन सांसदों का समर्थन सरकार को उस जादुई आंकड़े के करीब ले जाएगा।

हालाँकि, यह रणनीति जोखिमों से मुक्त नहीं है। बंगाल भाजपा के स्थानीय नेता इस विलय से असहज हैं क्योंकि जिन तृणमूल नेताओं के खिलाफ उन्होंने एक महीने पहले चुनाव लड़ा था, अब उन्हीं के साथ जुड़ना उनके समर्थकों को गलत संदेश दे सकता है। साथ ही, बागी गुट के मुस्लिम सांसदों को डर है कि भाजपा के साथ खुलकर जाने से उनके निर्वाचन क्षेत्रों में उन्हें नुकसान हो सकता है।

यह पूरा घटनाक्रम आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति में और बड़े भूचाल का संकेत है। जहां बागी सांसद अपनी सदस्यता बचाए रखने और सत्ता में अपनी जगह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं भाजपा और बागी गुट के लिए यह गठबंधन एक दोधारी तलवार साबित हो सकता है।