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मीडिया की सुनियोजित विश्वसनीयता का संकट

हाल के दिनों में बंगाल की राजनीति में जो घटनाक्रम देखने को मिला, वह केवल एक राजनीतिक अस्थिरता का उदाहरण नहीं था, बल्कि भारतीय मीडिया की कार्यप्रणाली पर लगे प्रश्नचिह्नों का एक अध्याय भी है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर बगावत की खबरों ने पिछले कुछ दिनों तक न केवल टीवी चैनलों की प्राइम टाइम डिबेट्स को गर्म रखा, बल्कि पूरे देश में एक ऐसा माहौल बनाया गया जैसे ममता बनर्जी की सत्ता का सूर्य अस्त हो चुका है।

सूत्रों के हवाले से ब्रेकिंग न्यूज का जो तांडव चला, उसने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की नैतिकता और तटस्थता को कटघरे में खड़ा कर दिया है। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि समाचार चैनल स्वयं एक राजनीतिक खिलाड़ी की भूमिका निभा रहे हैं। सूत्रों के हवाले से बागी गुट का भाजपा में विलय, ममता बनर्जी के नेतृत्व का अंत और पार्टी के टूटने की भविष्यवाणियों को जिस तरह से परोसा गया, वह पत्रकारिता के न्यूनतम मानकों का उल्लंघन था।

एक अज्ञात राजनीतिक दल, जिसका न कोई जनाधार था और न ही कोई डिजिटल अस्तित्व, उसे रातों-रात एक बड़े राजनीतिक विकल्प के रूप में पेश किया गया। क्या यह केवल सूचना देने का प्रयास था, या फिर एक नैरेटिव गढ़ने की साजिश? इस पूरे शोर-शराबे में उन आवाजों को सुनियोजित ढंग से दबाया गया जो ममता बनर्जी के समर्थन में मजबूती से खड़ी थीं।

शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद जैसे अनुभवी नेताओं का मुखर समर्थन, महुआ मोइत्रा की तार्किक दलीलें और कल्याण बनर्जी की तीखी प्रतिक्रियाएं मीडिया की सुर्खियों में गौण कर दी गईं। यह विरोधाभास स्पष्ट था: जो खबर एक खास एजेंडे के अनुकूल थी, उसे प्राइम टाइम पर घंटों तक चलाया गया, जबकि जो तथ्य उस नैरेटिव को चुनौती दे रहे थे, उन्हें हाशिए पर धकेल दिया गया। अब जब धुआं छंट चुका है और स्थिति स्पष्ट है, तो यह साफ हो गया है कि यह एक सोची-समझी पटकथा थी।

मीडिया की मदद से एक कृत्रिम बगावत को हवा दी जा रही थी ताकि ममता बनर्जी की सरकार को अस्थिर करने का वातावरण बनाया जा सके। मीडिया की विश्वसनीयता आज सबसे निचले पायदान पर है। जब कोई चैनल सूत्रों के नाम पर बिना किसी ठोस प्रमाण के किसी पार्टी के पतन की घोषणा करता है, तो वह जनता के भरोसे का कत्ल कर रहा होता है। यह सिर्फ एक राजनीतिक दल की बात नहीं है, बल्कि उस लोकतंत्र की है जिसके लिए मीडिया का स्वतंत्र और निष्पक्ष होना अनिवार्य है।

आज के दौर में ब्रेकिंग न्यूज की अंधी दौड़ ने इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म का गला घोंट दिया है। खबर की पुष्टि करना, तथ्यों की गहराई में जाना और दूसरे पक्ष को समान स्थान देना—ये पत्रकारिता के वे बुनियादी स्तंभ हैं, जिन्हें टीएमसी की बगावत की कवरेज के दौरान पूरी तरह से उपेक्षित किया गया। सोशल मीडिया के दौर में मुख्यधारा की मीडिया का यह व्यवहार और भी खतरनाक है।

लोग आज भी टेलीविजन को सच का आईना मानते हैं, और जब वही आईना किसी राजनीतिक स्वार्थ के लिए धुंधला कर दिया जाता है, तो समाज में भ्रम और नफरत का माहौल बनता है। मीडिया ने जिस तरह से इस बगावत को एक हकीकत की तरह परोसा, उसने न केवल पत्रकारिता की गरिमा को कम किया, बल्कि आम आदमी की समझ को भी गुमराह करने का प्रयास किया। अंततः, यह घटनाक्रम मीडिया संस्थानों के लिए एक आईना है। जनता अब धीरे-धीरे मीडिया के इस एजेंडा-आधारित चरित्र को पहचानने लगी है।

जिस दिन मीडिया ने निष्पक्षता छोड़कर नैरेटिव बनाना शुरू किया, उसी दिन उसकी विश्वसनीयता भी दांव पर लग गई। यदि मीडिया संस्थान अब भी अपनी भूल सुधार नहीं करते, तो वे केवल राजनीतिक प्रचारकों का एक माध्यम बनकर रह जाएंगे। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ जब खुद ही किसी राजनीतिक दल का प्रचारक बन जाए, तो देश की लोकतांत्रिक नींव कमजोर होना तय है। टीएमसी प्रकरण ने यह सिद्ध कर दिया है कि मीडिया की स्वतंत्रता का उपयोग अब जनहित के बजाय जनमत को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है, जो कि किसी भी स्वस्थ समाज के लिए एक घातक संकेत है।

लिहाजा खुद मीडिया ने अपने आचरण से ऐसे मोड़ पर खड़ा कर लिया है, जहां न सिर्फ उसे घाटा हो रहा है बल्कि जिसकी मदद वह करना चाह रहे हैं, उन्हें भी ऐसे गलत प्रचार से नुकसान ही हो रहा है। इसका प्रभाव हम किसान आंदोलन के दौरान भी देख चुके हैं जब किसानों को न जाने किस किस नाम से संबोधित किया गया। फिर भी जनता को अपने दिमाग पर भरोसा था और फर्जी नैरेटिव सेट करने का प्रयास तब भी विफल हो गया था।