भारतीय कानून पर हावी आयोग का साफ्टवेयर
भारत में मतदान के अयोग्य घोषित किए गए वयस्कों की कुल संख्या, कुछ आंकड़ों के अनुसार 13 करोड़ और अन्य के अनुसार 15 करोड़ है, जो कि मैक्सिको, जापान और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य जैसे देशों के सभी पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की कुल जनसंख्या के लगभग बराबर है। ये वयस्क भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा एक नई कार्यप्रणाली, यानी सॉफ्टवेयर-संचालित विशेष गहन पुनरीक्षण के माध्यम से मतदाता सूचियों को शुद्ध करने के अभियान के शिकार हुए हैं।
प्रौद्योगिकी के उपयोग में किए गए नवाचार और तार्किक विसंगतियों को बहुसंख्यक मामलों में आसानी से सुधारा जा सकता था, यदि चुनावी पंजीकरण अधिकारियों द्वारा बूथ-स्तरीय अधिकारियों के साथ मिलकर मानवीय विवेक का उपयोग किया जाता। इससे अधिकांश समस्याओं का समाधान हो जाता। इस बात के पुख्ता प्रमाण मौजूद हैं कि यह दावा बिल्कुल सही है; पश्चिम बंगाल में, जहाँ एसआईआर को लेकर विवाद लगातार जारी है, सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित न्यायाधिकरणों में पहुंचे मामलों में से 93 प्रतिशत से अधिक अपीलें उन योग्य मतदाताओं द्वारा दायर की गईं जिन्हें ज्यादातर तार्किक विसंगतियों के नाम पर सूची से बाहर कर दिया गया था।
ऐसी रिपोर्टों की पुष्टि हुई है कि जिन मतदाताओं ने पश्चिम बंगाल में अपने मताधिकार का प्रयोग किया था, वे मई के चुनावों के बाद अब खुद को मतदाता सूची से गायब पा रहे हैं। अपीलों के निपटारे की वर्तमान गति को देखा जाए तो, पश्चिम बंगाल में लगभग 37 लाख मतदाताओं के मताधिकार को बहाल करने में न्यायाधिकरणों को 12 साल या उससे अधिक का समय लग सकता है।
इस भारी-भरकम गड़बड़ी के लिए कौन जिम्मेदार है, यह एक समस्याग्रस्त सवाल है, जैसा कि केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी के नेता चिराग पासवाल ने कहा था, खासकर यदि लोग खुद चुनावी प्रक्रिया पर ही संदेह करने लगें। यह मुद्दा इंडियन एक्सप्रेस की खबर के जरिए उठाया गया था, जिसने आखिरकार भारतीय राजनीतिक व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया। ज्ञानेश कुमार चाहे जितने भी दोषी हों, दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों में से किसी ने भी निर्वाचन आयोग की इन चूकों के कारण अपने पद से इस्तीफा नहीं दिया।
13 करोड़ या 15 करोड़ प्रशासनिक गड़बड़ियां कोई क्षमा योग्य गलती नहीं हैं; इस विशालता का पैमाना सत्ता के उस लापरवाह दुरुपयोग की ओर इशारा करता है जो गैर-जिम्मेदारी की हद तक पहुंच जाता है, जिसकी जड़ में वह 2023 का कानून है जिसने चुनाव आयुक्तों को उनके फैसलों के परिणामों से छूट प्रदान की है। यदि दोनों चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—के मुख्य चुनाव आयुक्त से मतभेद थे, जो कि संयोगवश उनके बॉस नहीं हैं, क्योंकि इन तीनों के बीच का अंतर प्राधिकार की बजाय केवल पदनाम का है, तो उनके पास अपने प्राप्त अधिकारों के बल पर ऐसा कहने के पर्याप्त कारण थे।
पहले के चुनाव आयुक्तों ने ऐसा किया भी था। दिग्गज चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने एम.एस. गिल और जी.वी. कृष्णमूर्ति की नियुक्ति को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें यह सोचने के लिए फटकार लगाई थी कि उनका दर्जा उनके सहयोगियों से ऊपर है। 2009 में, तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को एक 90 पृष्ठों की रिपोर्ट भेजकर अपने सहयोगी चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की मांग की थी।
कॉलेजियम शैली के किसी भी आयोग, न्यायपालिका, मंत्रिमंडल या फिर यहां तक कि कॉर्पोरेट बोर्डरूम (जैसे टाटा संस-टाटा ट्रस्ट मामले में सार्वजनिक तौर पर देखा गया) में मतभेद होना एक आम बात है। असहमति के लिए जिम्मेदारी लेना एक कदम आगे की बात है, जहां आमतौर पर इस्तीफा देना ही एकमात्र सही कदम माना जाता है।
न तो श्री संधू ने और न ही श्री जोशी ने इस्तीफा दिया; किसी लीक के पीछे छुपते हुए, कानून के घोर उल्लंघन के दोषी इन दोनों व्यक्तियों ने अपने विचारों को कभी सार्वजनिक नहीं किया और न ही अपनी नैतिक जिम्मेदारी ली। इन दोनों चुनाव आयुक्तों ने भारत के कैबिनेट सचिव को आधिकारिक ज्ञापन लिखे, यह अच्छी तरह जानते हुए भी कि यह उस स्वायत्तता के सिद्धांत का गंभीर उल्लंघन है जो उस संवैधानिक प्रावधान का मूल आधार है जिसके तहत निर्वाचन आयोग का गठन किया गया था।
लोकसभा और राज्यसभा में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करना या उनके खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव पेश करना अच्छी राजनीति जरूर है। कानून का काम दोषियों को दंडित करना है और विधाई शक्ति का मुख्य उद्देश्य अच्छे कानूनों का निर्माण करना है। मुंबई हाईकोर्ट की पणजी बेंच की पीठ ने जो कहा है, वह सबसे ऊपर है। अदालत ने कहा है कि कानून से ऊपर कोई भी नहीं है और साफ्टवेयर के बहाने कानूनी प्रावधानों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।