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संविधान में अलग गुट का कोई प्रावधान नहीं: आचार्य

लोकसभा के पूर्व महासचिव ने नियमों का हवाला देकर बात कही

  • पुराने नियम अब बदल दिये गये हैं

  • संख्या का अब कोई मतलब नहीं है

  • पार्टी का अधिकार ममता के पास है

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों के लिए मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं। पूर्व लोकसभा महासचिव और संवैधानिक विशेषज्ञ पीडीटी आचार्य ने स्पष्ट किया है कि दल-बदल विरोधी कानून के तहत संसद में किसी पार्टी के भीतर अलग गुट के गठन का कोई प्रावधान नहीं है। आचार्य ने बताया कि 2003 के 91वें संविधान संशोधन के बाद वह प्रावधान हटा दिया गया था, जो किसी विद्रोही समूह को पार्टी की एक-तिहाई संख्या के आधार पर अयोग्यता से छूट देता था। उन्होंने कहा, अब केवल एक ही स्थिति में सदस्यता बच सकती है, जब मूल पार्टी का किसी दूसरी पार्टी के साथ विलय हो। सांसदों की संख्या चाहे कितनी भी हो, बिना औपचारिक विलय के वे दल-बदल विरोधी कानून के दायरे में आएंगे।

पीडीटी आचार्य के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष की इस मामले में कोई भूमिका नहीं है जब तक कि पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी स्वयं बागियों को अयोग्य घोषित करने की मांग न करें। उन्होंने कहा, बागियों द्वारा किसी को अपना नेता चुनना भी अवैध है, क्योंकि पार्टी का नेता नियुक्त करने का अधिकार केवल मूल पार्टी (ममता बनर्जी) के पास है।

यदि बागी गुट खुद को असली टीएमसी बताता है, तो यह मामला चुनाव आयोग के पास जाएगा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र राज्यपाल मामले (2023) के फैसले का हवाला देते हुए आचार्य ने कहा कि केवल विधायी बहुमत के आधार पर किसी गुट को असली पार्टी नहीं माना जा सकता। चुनाव आयोग को पार्टी की संगठनात्मक शक्ति और विधायी शक्ति, दोनों का आकलन करना होगा।

आचार्य ने जोर देकर कहा कि महाराष्ट्र (शिवसेना) का मामला टीएमसी से पूरी तरह अलग है, क्योंकि वहां पूरी पार्टी विभाजित हुई थी, जबकि टीएमसी के मामले में अभी केवल संसदीय दल के भीतर विद्रोह है। यह संवैधानिक स्थिति बागियों के लिए एक बड़ी कानूनी चुनौती पेश कर सकती है।