Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
INS Sharda Colombo Visit: भारत-श्रीलंका के बीच मजबूत हुआ समुद्री सहयोग; INS शारदा ने सफलतापूर्वक पूर... Indian Army Uniform Policy 2026: भारतीय सेना में बड़े बदलाव; गुलामी की निशानियाँ होंगी खत्म, नई गाइडल... Malviya Nagar Fire Case: कुक केशव नेगी की गिरफ्तारी पर उठे सवाल; जंतर-मंतर पर उत्तराखंड लोक मंच का व... TMC Crisis: तृणमूल कांग्रेस में बगावत पर अभिषेक बनर्जी का बड़ा कदम; स्पीकर से की अलग गुट को मान्यता न... Jharkhand Monsoon Update: मानसून के दस्तक देते ही वज्रपात का कहर; झारखंड में आकाशीय बिजली से 8 लोगों... UP Politics: 2027 में सपा-बसपा-कांग्रेस साथ भी आ जाएं तो नहीं रोक पाएंगे भाजपा की जीत - केशव प्रसाद ... Patna Coaching Dispute: खान सर की कोचिंग के बाहर पुलिस का नोटिस; मैनेजर सहित 3 स्टाफ को पूछताछ के लि... Solapur Road Accident: सोलापुर में पिकअप वाहन कुएं में गिरा; 14 लोगों की दर्दनाक मौत, प्रशासन की राह... TMC Political Crisis: टीएमसी के 20 बागी सांसदों का 'नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी' में विलय; एनडीए को दे... Delhi Police Big Move: अब हर शनिवार थानों में होगी 'जनसुनवाई'; दिल्ली पुलिस ने जारी किए नए दिशा-निर्...

चुनावी मौसम का हथियार बन गयी केंद्रीय एजेंसियां

भारतीय लोकतंत्र में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि एक ऐसा महासमर बन चुके हैं जहां जीत सुनिश्चित करने के लिए हर संभव दांव-पेंच का इस्तेमाल किया जाता है। बीते कुछ वर्षों में एक पैटर्न उभरक

र सामने आया है, जो देश की संवैधानिक संस्थाओं, विशेषकर केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। यह पैटर्न है—जरूरत के अनुसार जांच का। चुनाव आते ही कुछ पुराने मामले अचानक फाइलों से बाहर निकाल लिए जाते हैं, शोर मचाया जाता है, और चुनाव खत्म होते ही वे मामले पुनः ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। पिछले दिनों आई-पैक पर ईडी की रेड को लेकर जिस तरह का राजनीतिक हंगामा हुआ, वह किसी से छिपा नहीं है।

तब ऐसा लग रहा था कि यह कोई बहुत बड़ा घोटाला है, लेकिन चुनाव के नतीजे आते ही वह मुद्दा पूरी तरह गायब हो गया। अब ऐसा प्रतीत होता है कि आईपैक की छापामारी में ऐसा कुछ मिला है, जिसकी वजह से टीएमसी के अनेक सांसद मजबूरी में बागी बनते नजर आ रहे हैं। पंजाब नगर निकाय चुनाव से ऐन पहले दिल्ली आबकारी नीति का मुद्दा उछाला गया।

चुनाव संपन्न होते ही वह शोर थम गया। यह महज संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। ऐसा लगता है कि इन मामलों को झोले में बंद करके रखा जाता है और जैसे ही चुनावी बिगुल बजता है, इन्हें बाहर निकालकर राजनीतिक अखाड़े में उछाल दिया जाता है। यह खेल केवल दिल्ली या पंजाब तक सीमित नहीं है।

झारखंड के मुख्यमंत्री के खिलाफ जमीन कारोबार से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों का प्रकरण इसका जीता-जागता उदाहरण है। जब वह मामला अपने चरम पर था, तब ऐसा लग रहा था कि अब कार्रवाई होकर रहेगी, लेकिन आज उस मामले पर सन्नाटा पसरा हुआ है। यह स्पष्ट संकेत है कि केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल अब अपराध की जांच से ज्यादा चुनावी हथियार के तौर पर किया जाने लगा है।

जब जांच एजेंसियों का उपयोग प्रतिशोध या राजनीतिक लाभ के लिए होता है, तो इससे न केवल संबंधित दलों की छवि प्रभावित होती है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में आम जनता का भरोसा भी डगमगाता है। एक आम नागरिक के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कानून सिर्फ चुनाव के समय ही सक्रिय होता है? इस विसंगति का एक और भयावह पहलू कोलकाता से सामने आया है।

वहां चार हजार ईवीएम के जलने की घटना एक बेहद संवेदनशील और गंभीर मामला है, जो सीधे तौर पर चुनाव की पवित्रता और विश्वसनीयता से जुड़ा है। एक तरफ जहां मामूली राजनीतिक दावों पर जांच एजेंसियां सक्रिय हो जाती हैं, वहीं ईवीएम जैसी गंभीर घटना पर वैसी सक्रियता का न दिखना कई तरह के संदेह पैदा करता है।

यदि इन मशीनों के जलने की निष्पक्ष और त्वरित जांच नहीं होती है, तो यह लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे पर ही प्रहार है। क्या ईवीएम का जलना जांच एजेंसियों की प्राथमिकता सूची में नहीं है? या फिर इसमें उन लोगों के नाम आ सकते हैं जो सत्ता के गलियारों के करीब हैं? इन तमाम उदाहरणों को जोड़कर देखें तो साफ हो जाता है कि भारतीय राजनीति में एजेंसियों का डर एक मानक बन चुका है।

सत्ताधारी दल इन एजेंसियों के माध्यम से विपक्षी दलों को रक्षात्मक मुद्रा में लाने की कोशिश करते हैं, और चुनाव बीतने के बाद मामला रफा-दफा कर दिया जाता है। लेकिन इस पूरे प्रक्रिया में जो सबसे बड़ा नुकसान हो रहा है, वह है देश के इन्वेस्टिगेटिव सिस्टम की विश्वसनीयता का। यदि एजेंसियां निष्पक्ष काम नहीं करती हैं, तो अपराधी बेखौफ हो जाते हैं और ईमानदार व्यक्ति प्रताड़ित महसूस करता है।

अंततः, लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब उसकी संस्थाएं—चुनाव आयोग, न्यायपालिका और जांच एजेंसियां—स्वतंत्र रूप से कार्य करें। जब जांच का पैमाना राजनीतिक फायदे से तय होने लगे, तो वह कानून का शासन नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति का खेल बन जाता है। देश को जरूरत है कि जांच एजेंसियों को राजनीतिक चश्मे से बाहर निकाला जाए। चाहे मामला आबकारी घोटाले का हो, जमीन के कारोबार का, या फिर कोलकाता में ईवीएम जलने का—न्याय बिना किसी भेदभाव और बिना किसी चुनावी कैलेंडर के होना चाहिए। समय आ गया है कि देश की जनता इस पैटर्न को समझे और संस्थाओं की स्वायत्तता के लिए आवाज उठाए। यदि हम लोकतंत्र को बचाना चाहते हैं, तो हमें चुनावी हथियार के रूप में एजेंसियों के इस्तेमाल की इस संस्कृति को समाप्त करना होगा, अन्यथा लोकतंत्र की नींव कमजोर होती जाएगी और भविष्य की पीढ़ियां हमें इस विफलता के लिए कभी माफ नहीं करेंगी।