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यह अंधा कानून है, लोकतंत्र का डिलीट बटन.. .. .. 

हमारे महान लोकतंत्र में आजकल एक नया और बेहद लोकप्रिय खेल खेला जा रहा है, जिसका नाम है सफाई अभियान। यह देश की मतदाता सूचियों (इलेक्टोरल रोल्स) की डिजिटल झाड़ू-पोंछा है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस सफाई अभियान, यानी विशेष गहन संशोधन की संवैधानिकता पर अपनी मोहर क्या लगाई, सत्ता के गलियारों में मानों ढोल-नगाड़े बजने लगे। वाह! लोकतंत्र कितना स्वस्थ हो गया है! सूची इतनी साफ हो गई है कि उसमें से करोड़ों नाम ही गायब हो गए हैं।

कहते हैं कि एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए साफ-सुथरी मतदाता सूची उतनी ही जरूरी है जितना कि डॉक्टर के पर्चे पर साफ लिखावट। बिहार की पावन धरती पर जब चुनाव आयोग ने अपनी जादू की झाड़ू चलाई, तो करीब 47 लाख लोग उस झाड़ू की चपेट में आकर मतदाता सूची से सीधे बाहर गिर गए।

अब तमाशा देखिए। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एक बेहद बारीक और खूबसूरत बात कही। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग के पास यह जांचने का कोई अधिकार नहीं है कि कौन इस देश का नागरिक है और कौन नहीं। यह परम शक्ति तो केवल सक्षम प्राधिकारी यानी केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास सुरक्षित है। अब साहब, एक साधारण, कमअक्ल नागरिक के दिमाग में यह यक्ष प्रश्न कौंध रहा है कि जब चुनाव आयोग को नागरिकता तय करने का हक ही नहीं था, तो उसने किस दिव्य दृष्टि के आधार पर इतने लाख लोगों का डिलीट कर दिया?

इसी बात पर वर्ष 1983 में बनी सुपरहिट फिल्म अंधा कानून का यह गीत याद आ रहा है। इस गीत को लिखा था आनंद बक्षी ने और संगीत में ढाला था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने। इसे किशोर कुमार ने अपना स्वर दिया था।

नसीब इंसान का… नसीब इंसान का चाहत का मोहताज नहीं होता,

जहाँ वफ़ा हो वहाँ कोई राज़ नहीं होता।

मगर जहाँ कानून ही अंधा हो,

वहाँ इंसान का कोई मददगार नहीं होता!

अंधा कानून है! ये अंधा कानून है!

अंधा कानून है! ये अंधा कानून है!

जाने किधर है, किसका घर है,

कौन है कातिल, कौन है मुंसिफ (जज)

कुछ न पता है, कुछ न खबर है!

अंधा कानून है! ये अंधा कानून है!

रिश्वत के तराजू पर तिनका भी यहाँ तोले,

पैसा जो फेंके तो पत्थर भी यहाँ बोले।

सच्चाई यहाँ हारे, झूठा ही बाजी मारे,

इंसाफ की कुर्सी पर, बैठे हैं ये हत्यारे!

कानून की देवी तो, बस देखती रहती है,

कुछ कह नहीं सकती है, चुपचाप ये सहती है!

क्योंकि…

अंधा कानून है! ये अंधा कानून है!

मासूम तड़पता है, मुजरिम यहाँ हंसता है,

फांसी के फंदे से, वो साफ निकल जाता है।

गरीब की किस्मत में, बस रोना लिखा होता है,

अदालत के कमरों में, बस सौदा होता है!

गीता की कसम खाकर, सब झूठ ही बोलते हैं,

ईमान की बात यहाँ, कौड़ी में तौलते हैं!

क्योंकि…

अंधा कानून है! ये अंधा कानून है!

कल क्या यहाँ होगा, ये सोच के डरता हूँ,

इस देश के मालिक को, मैं याद ही करता हूँ।

इंसान की आँखों का, अब पानी सूखा है,

हर शख्स यहाँ बाबू, बस पैसे का भूखा है!

जब रक्षक ही भक्षक बनकर, राहें रोकेंगे,

तो आम आदमी फिर, किस पर भरोसा करेंगे!

क्योंकि…

अंधा कानून है! ये अंधा कानून है!

जाने किधर है, किसका घर है,

कौन है कातिल, कौन है मुंसिफ

कुछ न पता है, कुछ न खबर है!

अंधा कानून है! ये अंधा कानून है!

सर्वोच्च न्यायालय भी एक रहस्यमयी मुस्कान बिखेरकर चुप रह गया। उसने यह तो साफ कर दिया कि हक किसका है, लेकिन यह नहीं बताया कि जो हादसा हो गया, उसका जिम्मेदार कौन है? यह तो वही बात हुई कि डॉक्टर ने कहा, ऑपरेशन पूरी तरह सफल और संवैधानिक था, बस मरीज के फेफड़े गलती से गायब हो गए हैं, जिसकी जांच अब डाकघर करेगा।

बंगाल में भी इस झाड़ू ने अपना कमाल दिखाया और 27 लाख मतदाताओं को नॉन-सिटिजन की कतार में खड़ा कर दिया। अब वहां के लोग अदालतों और ट्रिब्यूनलों के चक्कर काट रहे हैं। ट्रिब्यूनल महोदय इतनी कछुआ गति से फाइलों को सरका रहे हैं कि शायद अगली दो-तीन पीढ़ियां वोट देने की उम्र पार कर जाएं, तब जाकर फैसला आएगा कि उनके दादाजी सचमुच भारतीय थे या नहीं।

संविधान की आत्मा चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है कि लोकतंत्र का मतलब समावेशन है, न कि अपने ही लोगों का देश निकाला। लेकिन डिजिटल युग के नए नीति-नियंताओं को डिलीट बटन दबाने में जो आनंद आ रहा है। असली नागरिक गायब हैं, और फाइलों में लोकतंत्र पूरी तरह स्वस्थ और अपडेटेड घोषित हो चुका है। अब तो बस यही दुआ है कि अगली बार जब आप सुबह उठें, तो अपनी मतदाता पर्ची जरूर देख लें, क्या पता आपका नाम भी कूड़ा समझकर साफ कर दिया गया हो!