उज्जैन का तिलभांडेश्वर महादेव: हर साल तिल के दाने बराबर बढ़ता है शिवलिंग! महाकाल की तर्ज पर मिलता है गार्ड ऑफ ऑनर
उज्जैन (मध्य प्रदेश): उज्जैन जिले की तराना तहसील मुख्यालय पर लगभग 2600 से 3000 वर्ष प्राचीन प्रसिद्ध तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर स्थित है।
यह पवित्र धाम तराना नगर सहित आसपास के 100 से अधिक गांवों के श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का मुख्य केंद्र है। इस ऐतिहासिक मंदिर की स्थापना होलकर राजवंश के कालखंड में हुई थी। जनमान्यता और धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, यहां विराजमान शिवलिंग स्वयंभू और जागृत है, जिसका आकार प्रतिवर्ष तिल के दाने के बराबर स्वतः बढ़ता जाता है। उज्जैन के विश्वप्रसिद्ध बाबा महाकाल की तर्ज पर तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर में भी प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि के दिन दोपहर में भस्म आरती का आयोजन होता है तथा सावन मास में निकलने वाली डोला/शाही सवारी के दौरान बाबा को पुलिस प्रशासन द्वारा गार्ड ऑफ ऑनर (Guard of Honor) दिया जाता है।
🔱 महाकाल की तर्ज पर निकलेगी बाबा तिलभांडेश्वर की शाही सवारी, सिंहस्थ से पहले जुटेंगे नागा संन्यासी
मंदिर के गादीपति और महंत मोहन भारती जी ने विस्तृत जानकारी देते हुए बताया, “प्राचीन काल में जहां महाकाल मंदिर सिंधिया स्टेट (Scindia State) के अंतर्गत आता था, वहीं तिलभांडेश्वर महादेव का यह मंदिर होलकर स्टेट (Holkar State) के अधिकार क्षेत्र में आता था। यहां श्रावण मास में भगवान तिलभांडेश्वर की पूजा-अर्चना का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। सावन में प्रतिदिन भोलेनाथ का भांग व पुष्पों से दिव्य श्रृंगार तथा रुद्राभिषेक संपन्न होता है।”
उन्होंने आगे बताया कि, “सावन के प्रत्येक सोमवार को बाबा महाकाल की तर्ज पर भव्य सवारी निकाली जाती है। भाद्रपद (भादो) के दूसरे सोमवार को जिस प्रकार महाकाल महाराज की राजसी (शाही) सवारी निकलती है, ठीक उसी भव्यता के साथ तिलभांडेश्वर भगवान की भी शाही सवारी निकाली जाएगी। आगामी उज्जैन सिंहस्थ कुंभ मेला को देखते हुए जूना अखाड़े का प्रमुख पड़ाव इस बार इंदौर के बजाय यहीं रहेगा, जिसके चलते इस बार की शाही सवारी में नागा संन्यासी तथा जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर भी विशेष रूप से सहभागिता करेंगे।”
👑 महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था मंदिर का जीर्णोद्धार, पूजन से पूरी होती हैं मनोकामनाएं
महंत जी ने मंदिर के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए बताया कि होलकर राजवंश की महान शासिका महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने अपने प्रवास के दौरान इस अति-प्राचीन तिलभांडेश्वर मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार करवाया था।
यह पावन धाम तराना क्षेत्र की धार्मिक चेतना का संवाहक है, जहां सावन मास के दौरान लाखों श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। चूंकि यहां स्थापित पाषाण शिवलिंग का आकार हर साल तिल के दाने के समान बढ़ता है, इसीलिए इसका नाम ‘तिलभांडेश्वर’ पड़ा। मान्यता है कि सावन मास में यहां भक्तिभाव से जल अर्पित करने और पूजन-पाठ करने से भक्तों की समस्त मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं।
🛡️ राजशाही काल की परंपराएं आज भी जीवित, सावन में निकलेंगी कुल 6 भव्य सवारियां
तिलभांडेश्वर मंदिर की मुख्य विशिष्टता महाकाल मंदिर की तर्ज पर निकलने वाली भव्य सवारियां, सशस्त्र बलों द्वारा दिया जाने वाला गार्ड ऑफ ऑनर और महाशिवरात्रि पर आयोजित होने वाली दोपहर की भस्म आरती है।
जैसे श्रावण मास में अवंतिकानाथ बाबा महाकाल की नगर भ्रमण सवारी निकलती है, ठीक उसी परंपरा का निर्वहन करते हुए तराना में भी सावन के दौरान कुल 6 सवारियां निकाली जाएंगी, जिनमें अपार जनसैलाब उमड़ने की संभावना है। श्रावण सोमवार को बाबा तिलभांडेश्वर रजत पालकी में सवार होकर प्रजा का हाल जानने नगर भ्रमण पर निकलते हैं। महाकाल मंदिर के पश्चात पूरे मध्य प्रदेश में तिलभांडेश्वर महादेव एकमात्र ऐसा देवालय है, जहां आज भी राजशाही काल की धार्मिक व्यवस्थाएं उसी मूल स्वरूप में पूरी निष्ठा के साथ संचालित हो रही हैं।