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लोगों को अदालती फैसलों की आलोचना करने का अधिकार

एनसीआरटी विवाद पर अब शीर्ष अदालत ने अपनी राय दी

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को एक याचिका का निपटारा करते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक टिप्पणी की। मुख्य न्यायाधीश कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि आम नागरिकों और संस्थाओं को न्यायपालिका के फैसलों पर अपनी राय रखने और उनकी आलोचना करने का पूरा अधिकार है। अदालत ने यह बात एनसीईआरटी (NCERT) की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक के एक पुराने संस्करण से जुड़े विवाद की सुनवाई के दौरान कही। इस पाठ्यपुस्तक में झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोगों (स्लम डवेलर्स) पर दिए गए एक अदालती फैसले की आलोचना की गई थी, जिस पर याचिकाकर्ता ने आपत्ति जताई थी।

पंकज पुष्कर द्वारा दायर इस याचिका में पाठ्यपुस्तक की उस टिप्पणी पर ध्यान आकर्षित किया गया था, जिसमें कहा गया था कि हाल के कुछ अदालती फैसले झुग्गीवासियों को शहर में एक अतिक्रमणकारी के रूप में देखते हैं। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि यह किसी फैसले के बारे में एक दृष्टिकोण मात्र है और इसे स्वस्थ आलोचना की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।

उन्होंने सवाल किया कि न्यायपालिका को इस तरह की टिप्पणियों को लेकर अतिसंवेदनशील क्यों होना चाहिए? पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि उसी पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका की संरचना, उसके कामकाज और अतीत में सुप्रीम कोर्ट द्वारा किए गए महत्वपूर्ण हस्तक्षेपों व उपलब्धियों का भी विस्तार से वर्णन किया गया है।

अदालत ने कहा कि यदि किसी पुस्तक में यह उल्लेख है कि कुछ फैसले आम लोगों के हितों के खिलाफ काम करते हैं, तो यह लोगों के अभिव्यक्ति के अधिकार का हिस्सा है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि आलोचना संतुलित होनी चाहिए और संबंधित पाठ्यपुस्तक ने न्यायपालिका के सकारात्मक पहलुओं को भी उजागर किया है।

इस मामले में पहले ही एक स्वतः संज्ञान मामले के माध्यम से आदेश पारित किए जा चुके थे, जिसके आधार पर कोर्ट ने इस रिट याचिका को समाप्त कर दिया। यह फैसला इस मायने में ऐतिहासिक है कि यह न्यायपालिका की जवाबदेही और सार्वजनिक विमर्श में इसकी भूमिका को और अधिक पारदर्शी बनाता है।