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ममता बनर्जी ने उच्चतम न्यायालय में रिट याचिका दायर की

मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया पर चुनाव आयोग पर आरोप

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भारत निर्वाचन आयोग द्वारा राज्य में चलाई जा रही विशेष गहन संशोधन प्रक्रिया को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। मुख्यमंत्री द्वारा दायर की गई यह रिट याचिका राज्य की चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और संवैधानिक नियमों के पालन को लेकर एक बड़े कानूनी टकराव का संकेत दे रही है।

ममता बनर्जी द्वारा यह याचिका 28 जनवरी को दायर की गई थी। मुख्यमंत्री का तर्क है कि निर्वाचन आयोग द्वारा बंगाल में अपनाई जा रही वर्तमान संशोधन प्रक्रिया लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम और उससे संबंधित नियमावली का स्पष्ट उल्लंघन है। इस कानूनी कदम से पहले, मुख्यमंत्री ने मुख्य चुनाव आयुक्त को एक औपचारिक पत्र भी लिखा था, जिसमें उन्होंने प्रक्रियागत खामियों और वैधानिक नियमों की अनदेखी पर अपनी गंभीर चिंता व्यक्त की थी।

याचिका में मुख्य रूप से यह आरोप लगाया गया है कि निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पारदर्शी नहीं है और यह स्थापित लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के विरुद्ध है। मुख्यमंत्री का मानना है कि इस प्रकार की ‘विशेष गहन समीक्षा’ से मतदाताओं के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ डेटा विसंगतियों के नाम पर नाम हटाए जाने की आशंका है।

यह कानूनी लड़ाई केवल मुख्यमंत्री तक सीमित नहीं है। इससे पहले, तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने भी उच्चतम न्यायालय में एक आवेदन दायर किया था। ओ’ब्रायन ने अपने आवेदन में एक बेहद गंभीर आरोप लगाया था कि भारत निर्वाचन आयोग चुनावी अधिकारियों को अनौपचारिक निर्देश जारी कर रहा है। उनका तर्क था कि आधिकारिक लिखित आदेशों के बजाय मौखिक या अनौपचारिक संदेशों के माध्यम से चुनावी मशीनरी को प्रभावित करना न केवल अनुचित है, बल्कि यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की नींव को भी कमजोर करता है।

उल्लेखनीय है कि हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने निर्वाचन आयोग को कई महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए थे। इन निर्देशों का उद्देश्य मसौदा मतदाता सूची के प्रकाशन के बाद तार्किक विसंगति सूची में शामिल व्यक्तियों के सत्यापन को सुचारू और पारदर्शी बनाना था। न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि किसी भी मतदाता का नाम हटाने या संशोधित करने की प्रक्रिया पूरी तरह से जांच-परख वाली और पारदर्शी होनी चाहिए ताकि किसी भी वास्तविक नागरिक का मताधिकार न छीने।