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एक सुनियोजित प्रचार का हिस्सा राघव चड्डा

आम आदमी पार्टी के इस आरोप में दम है कि राघव चड्डा की भाजपा से नजदीकियां बढ़ रही है। दरअसल हाल के दिनों में जनता के मुद्दे उठाने की वजह से वह सोशल मीडिया पर छा गये थे। अनेक लोगों ने उनके भाषणों के छोटे छोटे हिस्से काटकर उन्हें सोशल मीडिया में पोस्ट किया और ऐसे जननेता को समर्थन देने की अपील की।

टेलीकॉम कंपनियों से लेकर दूसरे सारे मुद्दे जनता के थे, इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है पर जिनलोगों ने उन्हें आज के दौर का सबसे अच्छा नेता बताने का काम किया, उनके सोशल मीडिया के रिकार्ड को खंगालने से दूसरे तथ्य सामने आ जाते हैं। यह भी स्पष्ट हो गया कि उनके भाषणों को सोशल मीडिया में इसका प्रचार मिलना भी एक रणनीति का हिस्सा है।

इस रणनीति को आम आदमी पार्टी ने पकड़ लिया और उन्हें राज्यसभा के उपनेता पद से हटा दिया। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए यह स्पष्ट है कि आम आदमी पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा और अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाले शीर्ष नेतृत्व के बीच बढ़ती दरार पार्टी के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है।

यह आंतरिक कलह विशेष रूप से पंजाब के लिए घातक साबित हो सकती है, जहाँ अगले 12 महीनों से भी कम समय में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। पंजाब, जो वर्तमान में आप का सबसे मजबूत गढ़ है, वहाँ इस तरह की गुटबाजी पार्टी की सत्ता बरकरार रखने की उम्मीदों को करारा झटका दे सकती है।

पार्टी आलाकमान ने हाल ही में एक बड़ा कड़ा कदम उठाते हुए राघव चड्ढा को उच्च सदन (राज्यसभा) में आप के उप-नेता के पद से हटा दिया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह निर्णय इसलिए लिया गया क्योंकि नेतृत्व को लगा कि चड्ढा संसद में पार्टी की आधिकारिक लाइन (विचारधारा) से भटक रहे थे। पद से हटाए जाने के बाद राघव चड्ढा ने भी चुप्पी तोड़ने का फैसला किया।

उन्होंने एक चुनौतीपूर्ण और विद्रोही लहजे में टिप्पणी करते हुए कहा कि उन्हें खामोश किया गया है, हराया नहीं गया है। उनका यह बयान सीधे तौर पर पार्टी नेतृत्व को दी गई चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। इस विवाद में अब पार्टी के अन्य दिग्गज नेता भी कूद पड़े हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान, दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी और दिल्ली इकाई के अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज जैसे वरिष्ठ नेताओं ने राघव चड्ढा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

इन नेताओं ने चड्ढा पर आरोप लगाया है कि वे मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर रहस्यमयी चुप्पी साधे हुए हैं। इसके अतिरिक्त, पार्टी और विपक्षी गठबंधन से जुड़े अन्य प्रमुख मामलों पर भी उनकी निष्क्रियता पर सवाल उठाए गए हैं। नेतृत्व का मानना है कि जब पार्टी को उनकी मुखरता की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब वे पीछे हट गए।

विडंबना यह है कि राघव चड्ढा संसद के भीतर और बाहर कई मुद्दों पर काफी मुखर रहे हैं। उन्होंने एयरलाइनों द्वारा बढ़ाए गए किराए, गिग वर्कर्स (अस्थायी कर्मचारी) की दुर्दशा और मोबाइल डेटा रिचार्ज प्लान में विसंगतियों जैसे जनहित के मुद्दों को जोर-शोर से उठाया है। लेकिन, आप नेतृत्व की नाराजगी का असली कारण कुछ और ही है। पार्टी के भीतर यह धारणा प्रबल हो गई है कि चड्ढा मोदी सरकार का सीधे तौर पर सामना करने से कतरा रहे हैं।

विपक्षी दलों द्वारा किए जाने वाले वॉकआउट (सदन का बहिष्कार) में उनकी भागीदारी न होना नेतृत्व को रास नहीं आ रहा है। एक बड़ा संकेत तब मिला जब लगभग एक महीने पहले दिल्ली की एक अदालत ने आबकारी नीति मामले में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य आप नेताओं को दोषमुक्त कर दिया था, लेकिन चड्ढा ने पूरी तरह चुप्पी साधे रखी।

इसके अलावा, 1 मार्च को जंतर-मंतर पर केजरीवाल द्वारा संबोधित की गई रैली से उनकी अनुपस्थिति ने भी आग में घी डालने का काम किया। पिछले साल दिल्ली में हार का सामना करने के बाद, आप अब किसी भी कीमत पर पंजाब को अपने हाथ से निकलने नहीं देना चाहती। पंजाब में सत्ता विरोधी लहर पहले से ही एक बड़ी चुनौती है।

इसके साथ ही, इस बार का मुकाबला बहुकोणीय होने वाला है। राजनीति में एकजुटता ही सबसे बड़ी ताकत होती है। यदि पार्टी अपने कुनबे को एक साथ रखने में विफल रहती है, तो आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव के परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं। नेतृत्व को यह समझना होगा कि व्यक्तिगत अहंकार की तुलना में पार्टी का अस्तित्व और कार्यकर्ताओं का मनोबल अधिक महत्वपूर्ण है। भले ही राघव खुद कुछ ना कहें पर सोशल मीडिया के प्रचार की रणनीति काफी कुछ बयां कर रही है कि उनकी सोच किधर जा रही है।