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गुल ना जाने, पर मतदाता सब पहचाने है!

देश की राजनीति इन दिनों किसी पुरानी और सस्ती फिल्मी पटकथा जैसी हो गई है, जिसके निर्देशक परदे के पीछे बैठे हैं और खलनायक अपनी भूमिका पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं। चुनाव में वोट चोरी के नए-नए कारनामों और एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) के नाम पर जो कलाकारी चल रही है, उसकी परतें अब इतनी उधड़ चुकी हैं कि बच्चा-बच्चा जान गया है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी की पूरी दाल ही काली है।

इस बार तो इस खेल में तकनीकी दिग्गज कंपनी टीसीएस भी निशाने पर आ गई है। लगता है कि लोकतंत्र को री-बूट करने के लिए अब किसी सॉफ्टवेयर अपडेट की नहीं, बल्कि सीधे सिस्टम फॉर्मेट करने की जरूरत आन पड़ी है। अब पता नहीं किस दिन अचानक आयोग में साफ्टवेयर की जिम्मेदारी संभालने वाली सीमा जी पर भी पहाड़ टूट पड़े।

चुनाव आयोग ऊपर से जितना मजबूत दिखता था वह अंदर से उतना ही कमजोर है। बातें अगर बाहर आ रही हैं तो यह मान लेना चाहिए कि उस किले की दीवार में कोई स्थान टूटा है, जहां से अंदर की खबरों बाहर आने लगी हैं। किसी दिन ईवीएम अथवा चुनाव आयोग के साफ्टवेयर के बारे में भी कोई गोपनीय तथ्य सामने आ गया तो हैरानी नहीं होगी। जाहिर है कि इस सिस्टम के अंदर से टूट पैदा हो चुकी है।

हालाँकि, हमारे हुक्मरानों का हाल यह है कि वे हर बार बात घुमाने और जनता का ध्यान भटकाने का ऐसा पुराना और घिसा-पिटा खेल खेलते हैं कि अब खुद उन्हें भी हंसी आ जाती होगी। वे समझते हैं कि जनता बेवकूफ है और वे जो कहेंगे, लोग आंख मूंदकर मान लेंगे। मगर इस देश की जनता अब उनके किसी भ्रम में आने वाली नहीं है।

यह दीगर बात है कि इतना सब कुछ दूध की तरह साफ हो जाने के बाद भी हमारे देश में कुछ खास किस्म के लोगों की मोदी भक्ति में रत्ती भर भी कमी नहीं आई है। उनकी नजर में दुनिया इधर से उधर हो जाए, सूर्य पश्चिम से उग जाए, लेकिन नरेंद्र मोदी जो करते हैं, वह सौ फीसदी सही ही होता है। उनके लिए तर्क, प्रमाण और संविधान मायने नहीं रखते, सिर्फ साहिब की मर्जी ही उनका संविधान है।

इसी बात पर फिल्म एक नजर का यह गीत याद आ रहा है। इस गीत को लिखा था मीर तकी मीर ने और संगीत में ढाला था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने। इस गीत को लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी ने अपना स्वर दिया था। गीत को बोल इस तरह हैं।

हाल हमारा जाने है, पत्ता पत्ता…

जाने न जाने गुल ही न जाने

बाग तो सारा जाने है, पत्ता पत्ता…

कोई किसी को चाहे, तो क्यूं गुनाह समझते हैं लोग

कोई किसी की खातिर, तरसे अगर तो हँसते हैं लोग

बेगाना आलम है सारा, यहाँ तो कोई हमारा

दर्द नहीं पहचाने है, पत्ता पत्ता…

चाहत के गुल खिलेंगे, चलती रहे हज़ार आँधियाँ

हम तो किसी चमन में, बाँधेंगे प्यार का आशियाँ

ये दुनिया बिजली गिराए, ये दुनिया काँटे बिछाए

इश्क़ मगर कब माने है, पत्ता पत्ता…

दिखलाएंगे जहाँ को, कुछ दिन जो ज़िन्दगानी है और

कैसे न हम मिलेंगे, हमने भी दिल में ठानी है और

अभी मतवाले दिलों की, मुहब्बत वाले दिलों की

बात कोई क्या जाने है, पत्ता पत्ता…

बेचारे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अकेले ही इस सियासी तूफान का सारा हमला अपने ऊपर झेल रहे हैं। वे दिन-रात सफाई देते-देते थक चुके हैं, जबकि वे लोग जिनके फायदे के लिए यह सारा चक्रव्यूह रचा गया है, वे महलों में आराम से चुप्पी साधे बैठे हैं। कभी-कभार पार्टी के छुटभैया या चंद गिने-चुने भाजपा नेता दो-चार लाइन का बासी बयान देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं, मानो उनका इस पूरी प्रक्रिया से दूर-दूर तक कोई लेना-देना ही न हो।

कुल मिलाकर, माहौल ऐसा अजीबोगरीब हो गया है कि चोर मचाए शोर और रखवाला खुद कटघरे में खड़ा है। जनता सब देख रही है, सब समझ रही है और अंदर ही अंदर मुस्कुरा भी रही है। वक्त का पहिया घूम रहा है और लोकतंत्र की इस अजब नौटंकी को देखकर बस यही कहा जा सकता है कि परदे के पीछे के खिलाड़ी चाहे जितनी चालाकियां कर लें, सच एक दिन बाहर आ ही जाता है।

बस, अब देखना यह है कि यह गुल अपनी नींद से कब जागता है, क्योंकि बाग का हर पत्ता तो सच्चाई जान ही चुका है! लेकिन सच सामने आने के बाद का सीन क्या होगा, यह सोचना भी मजेदार है। खास कर मुख्य धारा के मीडिया चैनलों के कुछ खास चेहरों का। कंपनियों ने धीरे धीरे रंग बदलना चालू कर दिया है। लेकिन अपनी पहचान को मोदी भक्त के तौर पर स्थापित कर चुके वैसे पत्रकार क्या करेंगे और क्या फिर से जेल जाएंगे, यह बड़ा सवाल बना हुआ है।