तेइस साल के बाद इराक से अमेरिकी सेना गयी
बगदादः संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा इराक पर आक्रमण किए जाने के तेईस साल बाद, अंतिम अमेरिकी सैनिक भी वहां से चले गए हैं। वाशिंगटन इसे अपने सैन्य मिशन का अंत बता रहा है, जबकि बगदाद इसे पूर्ण संप्रभुता की दिशा में एक और कदम करार दे रहा है। हालांकि, इतिहास इस युद्ध के प्रति इतना उदार नहीं रहा है।
इराक पर यह दावा करते हुए आक्रमण किया गया था कि सद्दाम हुसैन के पास विनाशकारी हथियार हैं, जो कि बाद में पूरी तरह झूठा साबित हुआ। युद्ध के परिणाम सामने आने से बहुत पहले ही इसे जीता हुआ घोषित कर दिया गया था। साल 2003 का प्रसिद्ध मिशन अकम्प्लिश्ड पल इराक युद्ध के उस केंद्रीय भ्रम को दर्शाता है, जहां सैन्य विजय को राजनीतिक समझौते के रूप में समझ लिया गया था।
इस आक्रमण ने सद्दाम हुसैन को तो सत्ता से बेदखल कर दिया, लेकिन इसने देश की संस्थाओं को भी तहस-नहस कर दिया, सांप्रदायिक दूरियों को गहरा किया, गृह संघर्ष को बढ़ावा दिया और ऐसी परिस्थितियों को जन्म दिया जिससे इस्लामिक स्टेट (IS) का उदय हुआ। इस संघर्ष में लाखों इराकी नागरिकों की जान गई, 4,500 से अधिक अमेरिकी सैनिक मारे गए और पूरा क्षेत्र भारी उथल-पुथल की चपेट में आ गया।
अमेरिका ने साल 2011 में देश छोड़ दिया था, लेकिन महज तीन साल बाद इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों द्वारा देश के बड़े हिस्से पर कब्जा करने और मोसुल पर कब्जा जमाने के बाद उसे वापस लौटना पड़ा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का कहना है कि किसी अस्थायी मिशन को स्थायी उपस्थिति में बदलने का कोई औचित्य नहीं था।
फिर भी, किसी सैन्य मिशन को समाप्त करने और बहुआयामी संघर्ष को खत्म करने के बीच का अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। इस्लामिक स्टेट ने अपना क्षेत्र खो दिया है, लेकिन चरमपंथी नेटवर्क, सांप्रदायिक राजनीति, सशस्त्र मिलिशिया और क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विताएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि पीछे छूटे खाली स्थान को कौन भरेगा।
बगदाद को यह साबित करना होगा कि उसकी अपनी सुरक्षा संस्थाएं मिलिशिया की ताकत और इस्लामिक स्टेट के फिर से सिर उठाने के खतरे दोनों को नियंत्रित करने में सक्षम हैं। इसलिए, अमेरिकी सैनिकों की यह वापसी एक अध्याय को बंद कर सकती है, लेकिन अगले स्थिर अध्याय की कोई गारंटी नहीं देती है।
भारत के लिए यह सबक और भी अधिक मायने रखता है। न्यूयॉर्क में एशिया सोसाइटी में बोलते हुए, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में इस बात पर जोर दिया कि आतंकवाद नई दिल्ली की केंद्रीय सुरक्षा चिंताओं में से एक है। उन्होंने चेतावनी दी कि किसी साझेदार देश द्वारा सीमा पार आतंकवाद को पर्याप्त रूप से न समझ पाना द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित कर सकता है।
यह इराक का सबसे बड़ा और चिरस्थायी सबक है। केवल किसी भू-भाग पर कब्जा करके, कमांडरों को हराकर या शासन बदलकर आतंकवाद को परास्त नहीं किया जा सकता है। न ही सुरक्षा को अनिश्चित काल तक विदेशी सेनाओं के भरोसे छोड़ा जा सकता है।
अगले चरण का मुख्य फोकस सक्षम राष्ट्रीय संस्थाओं, जवाबदेह सरकारों, खुफिया सहयोग और आतंकवाद के सुविधाजनक व असुविधाजनक रूपों के बीच भेद न करने की नीति पर होना चाहिए। अमेरिकी भले ही अपने घर लौट चुके हैं, लेकिन इराक की रणनीतिक उथल-पुथल के परिणाम पश्चिम एशिया और उसके बाहर भी आने वाले कई दशकों तक महसूस किए जाते रहेंगे।