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अमेरिका में फिर से डोनाल्ड ट्रंप विरोधी आंदोलन ने जोर पकड़ा

नो किंग्स नामक संगठन का देश व्यापी प्रदर्शन

वाशिंगटनः अमेरिका के राजनीतिक इतिहास में एक अभूतपूर्व घटनाक्रम के तहत, इस शनिवार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके प्रशासन के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों की लहर उठने वाली है। नो किंग्स नामक इस आंदोलन के तहत आयोजकों ने भविष्यवाणी की है कि यह अमेरिकी इतिहास के सबसे बड़े एकल-दिवसीय प्रदर्शनों में से एक होगा। इस विरोध प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य लोकतंत्र की रक्षा करना और राष्ट्रपति की शक्तियों पर संवैधानिक अंकुश की मांग करना है।

आयोजकों के अनुसार, अमेरिका के सभी 50 राज्यों में 3,200 से अधिक कार्यक्रमों की योजना है। हालांकि न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स, वाशिंगटन डीसी और मिनेसोटा के ट्विन सिटीज (मिनियापोलिस-सेंट पॉल) जैसे बड़े महानगरों में प्रमुख रैलियां आयोजित की जाएंगी, लेकिन इस बार आंदोलन का असली केंद्र अमेरिका का ग्रामीण और उपनगरीय इलाका, जिसे हार्टलैंड कहा जाता है, बनकर उभरा है। इस प्रदर्शन में शामिल होने वाले लगभग दो-तिहाई लोग बड़े शहरों के बाहर से आने की उम्मीद है।

पिछले साल जून में हुए इस आंदोलन के पहले बड़े प्रदर्शन की तुलना में, छोटे समुदायों और कस्बों में भागीदारी में लगभग 40 प्रतिशत की भारी वृद्धि देखी गई है। यह बदलाव बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि हार्टलैंड के इन इलाकों को पारंपरिक रूप से रिपब्लिकन पार्टी और ट्रंप का गढ़ माना जाता रहा है। 90 लाख से अधिक अमेरिकियों के इस विरोध प्रदर्शन में शामिल होने का अनुमान है, जो न केवल अपनी आवाज उठा रहे हैं बल्कि अपनी सामाजिक और राजनीतिक स्थिति को भी दांव पर लगा रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदर्शनकारियों का यह गुस्सा ट्रंप प्रशासन की हालिया नीतियों, विशेष रूप से ईरान के साथ चल रहे युद्ध और घरेलू शासन में राष्ट्रपति की निरंकुश शैली को लेकर है। नो किंग्स का नारा सीधे तौर पर अमेरिकी संविधान के उस मूल सिद्धांत की ओर इशारा करता है कि अमेरिका में कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है और राष्ट्रपति कोई राजा नहीं है।

शनिवार को होने वाले इन प्रदर्शनों के लिए सुरक्षा व्यवस्था भी चाक-चौबंद की गई है, क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में लोगों का सड़कों पर उतरना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। यदि आयोजकों के दावे सही साबित होते हैं, तो यह आंदोलन ट्रंप सरकार के लिए एक गंभीर चेतावनी होगी, जो यह दर्शाती है कि विरोध की गूँज अब केवल उदारवादी शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के भीतरी हिस्सों तक पहुँच चुकी है।