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भाजपा को मिला चुनावी चंदे का  82 फीसद हिस्सा

देश में सत्ता और कॉरपोरेट गंठजोड़ का नया नमूना सामने आया

  • सत्ता और विपक्ष में काफी असमानता

  • इलेक्ट्रोरल ट्रस्टों का भी यही रवैया रहा

  • सपा सहित कई दलों को कोई चंदा नहीं

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: भारत की राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से बनाए गए इलेक्टोरल ट्रस्टों के ताजा आंकड़ों ने एक बार फिर सत्ताधारी दल और विपक्ष के बीच संसाधनों की भारी असमानता को उजागर कर दिया है। वित्त वर्ष 2024-25 के लिए चुनाव आयोग को सौंपी गई योगदान रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को इलेक्टोरल ट्रस्टों के माध्यम से प्राप्त होने वाले चंदे का शेर-हिस्सा मिला है। आंकड़ों के मुताबिक, नौ इलेक्टोरल ट्रस्टों द्वारा वितरित कुल 3,811.34 करोड़ रुपये में से भाजपा ने अकेले 3,142.65 करोड़ रुपये प्राप्त किए हैं, जो कुल राशि का रिकॉर्ड 82.45 फीसद है।

इलेक्टोरल ट्रस्ट का गठन कॉरपोरेट घरानों और बड़े व्यवसायों द्वारा किया जाता है ताकि वे राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले दान को एक व्यवस्थित और पारदर्शी रूप दे सकें। सरकारी नियमों के अनुसार, इन ट्रस्टों के लिए यह अनिवार्य है कि वे एक वित्तीय वर्ष के दौरान प्राप्त कुल योगदान का कम से कम 95 फीसद हिस्सा पंजीकृत राजनीतिक दलों को वितरित कर दें। इस प्रक्रिया का उद्देश्य चंदे की प्रक्रिया से नकद के प्रभाव को कम करना और दानदाताओं की पहचान को रिकॉर्ड पर रखना है।

प्रमुख दानदाता और ट्रस्टों की भूमिका रिपोर्ट के अनुसार, सत्या इलेक्टोरल ट्रस्ट चंदा वितरण में सबसे आगे रहा, जिसने कुल 141.78 करोड़ रुपये का योगदान दिया। दिलचस्प बात यह है कि इस ट्रस्ट के कुल फंड का 75 फीसद से अधिक हिस्सा सीधे भाजपा के खाते में गया। अधिकार समूह एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के विश्लेषण से पता चलता है कि देश के दिग्गज कॉरपोरेट घराने जैसे इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस, डीएलएफ, टाटा स्टील और टाटा संस इन ट्रस्टों के सबसे बड़े वित्तपोषक रहे हैं। जहां इंडियाबुल्स और डीएलएफ ने सत्या ट्रस्ट को प्राथमिकता दी, वहीं टाटा समूह की कंपनियों ने प्रोग्रेसिव इलेक्टोरल ट्रस्ट के माध्यम से अपना योगदान दिया।

विपक्ष और क्षेत्रीय दलों की स्थिति फंडिंग के इस विशाल महासागर में विपक्षी दलों की स्थिति काफी कमजोर नजर आ रही है। देश की मुख्य विपक्षी पार्टी, कांग्रेस का हिस्सा कुल चंदे में 8 फीसद से भी कम रहा। हालांकि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी जैसे अन्य राष्ट्रीय दलों को भी कुछ राशि प्राप्त हुई, लेकिन वह भाजपा के मुकाबले ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। क्षेत्रीय दलों की बात करें तो, 15 से अधिक मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय दलों को मिलाकर कुल 27.58 करोड़ रुपये का चंदा मिला। विशेषज्ञों का मानना है कि सत्ताधारी दल और विपक्ष के बीच चंदे की यह गहरी खाई भविष्य के चुनावों में प्रचार के स्तर को प्रभावित कर सकती है।