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जरा सामने तो आओ छलिए.. .. .. ..

जरा सामने तो आ जाइसे जनाब। बात निकली है तो दूर तलक जाएगी ही जाएगी। इधर उधर भटकाने का खेल अब पुराना पड़ चुका है। इंडियन मैंगो मैन भी अब इन भटकाव वाली बातों का पेंच समझ चुका है। इसलिए असली मुद्दे पर आना पड़ेगा कि वोट चोरी हुआ या नहीं, मतदाता सूची से नाम हटाने में सारा खेल कहां कहां से हुआ।

अब तक तो निजी जांच में उन फोन नंबरों की भी जांच कर ली गयी है जो दरअसल कर्नाटक के नहीं थे। किन किन राज्यों पर ऐसे नंबर दर्ज हैं, वह लोगों की जानकारी मे है। जिस तरीके से नाम काटने के बारे में जानकारी दी गयी है, उससे साफ है कि यह सामान्य इंसानी प्रयास के तौर पर नहीं किया जा सकता है।

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने जो दलील दी है, इसमें एक पैटर्न भी साफ हो गया है कि हर मतदाता सूची का पहला व्यक्ति ही सुबह चार बजे उठकर नाम काटने का आवेदन ऑनलाइन दाखिल करता है। अब फालतू की बातें करने से तो बेहतर है कि असली सच्चाई क्या है, उसे सामने लाया जाए।

मानता हूं कि इससे कई लोगों को परेशानी हो सकती है पर यह याद रखना भी जरूरी है कि यह देश ही देश के मैंगो मैन के पैसे से चल रहा है। नेता अफसरों की शाहखर्ची का बोझ भी जनता ही उठा रही है। ऐसे में बार बार गंभीर विषय को टाल देना खतरनाक हो सकता है। इसके नमूने देश के कई स्थानों पर साफ साफ दिखने लगे हैं।

आगरा में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के आवास पर जमकर हंगामा किया। कार्यकर्ताओं ने सीईसी के आवास पर वोट चोर निवास लिखा पोस्टर लगाने की कोशिश की। पुलिस ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को रोका तो आधे घंटे तक धक्कामुक्की और तीखी नोकझोंक हुई। इस दाैरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ ही पुलिसकर्मी भी गिर पड़े, जिसमें कुछ लोगों को मामूली चोट आई। पुलिस के उच्चाधिकारी भी मौके पर पहुंचे और कार्यकर्ताओं को शांत कराया।

अमित शाह की जनसभा में जब खुद मोटा भाई ने राहुल गांधी का मुद्दा पूछ लिया तो जनता ने वोट चोरी का नारा लगाया औऱ बेचारे अमित शाह झेंप गये। उन्हें शायद इस बात की उम्मीद नहीं थी कि जनता इस तरीके से भी प्रतिक्रिया दे सकती है। बोल कोई नहीं है पर भाजपा के अंदर भी लोग अब बदले हालात से सहमे हुए हैं क्योंकि यह सवाल बड़ा होता जा रहा है।

इसी बात पर पुरानी फिल्म जनम जनम के फेरे का एक गीत याद आ रहा है। इस गीत को लिखा था भरत व्यास ने और संगीत में ढाला था एस एन त्रिपाठी ने। इसे लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल इस तरह हैं।

ज़रा सामने तो आओ छलिये

छुप छुप छलने में क्या राज़ है

यूँ छुप ना सकेगा परमात्मा

मेरी आत्मा की ये आवाज़ है

ज़रा सामने …

हम तुम्हें चाहे तुम नहीं चाहो

ऐसा कभी नहीं हो सकता

पिता अपने बालक से बिछुड़ से

सुख से कभी नहीं सो सकता

हमें डरने की जग में क्या बात है

जब हाथ में तिहारे मेरी लाज है

यूँ छुप ना सकेगा परमात्मा

मेरी आत्मा की ये आवाज़ है

ज़रा सामने …

प्रेम की है ये आग सजन जो

इधर उठे और उधर लगे

प्यार का है ये क़रार जिया अब

इधर सजे और उधर सजे

तेरी प्रीत पे बड़ा हमें नाज़ है

मेरे सर का तू ही सरताज है

यूँ छुप ना सकेगा परमात्मा

मेरी आत्मा की ये आवाज़ है

ज़रा सामने …

तो भइया अब पर्दे के पीछे छिपने का कोई फायदा नहीं है। भाई ज्ञानेश कुमार के आने भर से अब काम नहीं चलने वाला। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार को भी सामने आना चाहिए, जिनके बारे में यह कहा गया था कि वह दिल्ली में अपने सरकारी आवास पर ही निवास कर रहे हैं।

मुद्दा गंभीर है तो पहले जैसा टालने वाली बातों से अब जनता का मन बदलने वाला नहीं है। बिहार के भागलपुर में अडाणी को एक रुपये वार्षिक दर पर एक हजार एकड़ से अधिक जमीन देने का मामला भी गरमा रहा है। आखिर देश का हर ऐसा फैसला अडाणी के ही पक्ष में क्यों जाता है, यह बड़ी बात है और इससे जुड़े एक नहीं अनेक सवाल जनता के मन में कौंध रहे हैं।

जनता दिनोंदिन गरीब हो रही है और अडाणी जी दिनोंदिन अमीर हो रहे हैं। यह कैसा फार्मूला है जो देश में दो किस्म की अर्थव्यवस्था को संचालित कर रहा है। जनता के सवालों को यूं ही टालते जाने का खतरा क्या होता है, यह हम पड़ोसी देश नेपाल में देख चुके हैं। इसलिए अब सच को पर्दे से बाहर ले आइये वरना जनता का मूड बिगड़ गया तो वह खुद सभी को खींचकर सड़क पर ले आयेगी।