पुलिस विभाग में बदल जाएंगे पूर्व के समीकरण
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आरोप पत्र से एक नाम चुपके से हटाया गया
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सौदेबाजी में एक डीएसपी का नाम सामने
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विभाग में बदलाव से हालात स्पष्ट होंगे
रजत कुमार गुप्ता
रांची: झारखंड का बहुचर्चित शराब घोटाला कांड अब झारखंड की राजनीति और खासकर अफसरशाही को प्रभावित करने जा रहा है। दरअसल जब इस मामले में विनय चौबे को जमानत मिली तो लोगों का ध्यान इस तरफ कम गया। राज्य के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी विनय चौबे को कभी हेमंत सोरेन का बहुत करीबी माना जाता था पर निलंबित होने के कुछ माह पहले उनसे मुख्यमंत्री ने स्पष्ट तौर पर दूरी बना ली थी।
इसकी एक खास वजह पुलिस पुल से डीजीपी आवास पर उनका जाना था, जो दरअसल आजसू प्रमुख सुदेश महतो के आवास के करीब था। नजर रखने वालों ने मुख्यमंत्री तक यह जानकारी पहुंचा दी कि विनय चौबे अक्सर ही सुबह के वक्त सुदेश महतो से भेंट कर रहे हैं। इसकी वजह से अचानक ही मुख्यमंत्री के सारे कार्यक्रमों से उनकी मौजूदगी गायब हो गयी। उसके बाद विनय चौबे तक दिल्ली गये तो वहां की गतिविधियों की जानकारी मिलने के बाद मुख्यमंत्री ने एसीबी को उनके खिलाफ जांच करने का आदेश दे दिया। नतीजा था कि वह गिरफ्तार होकर जेल चले गये।
उनके जेल से बाहर आने के बाद धीरे से यह सवाल खड़ा हुआ कि आखिर एसीबी ने आरोप पत्र क्यों दाखिल नहीं किया। इस बीच यह जानकारी भी सामने आ गयी कि एसीबी अदालत ने बुधवार को तीन आरोपियों को डिफ़ॉल्ट जमानत दे दी, क्योंकि भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) 38 करोड़ रुपये के शराब घोटाला मामले में उनकी गिरफ्तारी के बाद निर्धारित 90 दिनों के भीतर आरोपपत्र दाखिल करने में विफल रहा। अदालत ने झारखंड राज्य पेय पदार्थ निगम लिमिटेड के महाप्रबंधक (जीएम) सुधीर कुमार दास, पूर्व जीएम वित्त सुधीर कुमार और मार्शन कंपनी के एक कर्मचारी नीरज कुमार को जमानत दे दी।
मामले की जानकारी रखने वालों का कहना है कि दरअसल इस मामले में एसीबी प्रमुख और राज्य के प्रभारी डीजीपी अनुरोग गुप्ता ने बिना हेमंत सोरेन की जानकारी के, एक और अभियुक्त का नाम इस आरोप पत्र से हटा दिया था। अपुष्ट जानकारी के मुताबिक यह व्यक्ति नेक्स जेन का मालिक विनय सिंह था। पुलिस मुख्यालय में इस बात की भी चर्चा है कि इस सौदेबाजी में डीजीपी का एक करीबी डीएसपी सक्रिय था और चार्जशीट से नाम हटाने के एवज में काफी बड़ी रकम का भुगतान किया गया।
किसी माध्यम से इस गड़बड़ी की जानकारी हेमंत सोरेन के करीबी लोगों तक पहुंची तो खेल ही पलट गया। इसी वजह से आरोप पत्र दाखिल करने पर रोक लगा दी गयी। जानकार बताते हैं कि दरअसल डीजीपी अनुराग गुप्ता भी वही गलती कर बैठे, जो पहले विनय चौबे ने किया था। मुख्यमंत्री की जानकारी के बिना अपनी तरफ से पहल करना अब अनुराग गुप्ता के लिए भी खतरे की घंटी है।
जानकार मानते हैं कि यदि सारी सूचनाएं सही हैं तो शीघ्र ही अनुराग गुप्ता को एसीबी और निगरानी के प्रभार से हटा दिया जाएगा और संभव है कि उन्हें प्रभारी डीजीपी के पद से भी हटा दिया जाए। अब उन चंद अफसरों की पहचान हो रही है, जो इस खेल में किसी न किसी तौर पर शामिल रहे हैं। जाहिर है कि सरकार का कहर उनपर भी टूटेगा।