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दुश्मन ना करे दोस्त ने वो काम किया .. .. .. ..

सही बात है कि राजनीति और कूटनीति की गाड़ी कब किस तरफ चली जाएगी कोई नहीं कह सकता। इसलिए विद्वान लोग कह गये हैं कि इनमें कोई  स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता। अब अपने मोदी जी को देख लीजिए। पहले तो डोनाल्ड ट्रंप को भारत बुलाया और शानदार स्वागत किया।

उसके बाद खुद अमेरिका गये और डोनाल्ड ट्रंप के पक्ष में प्रचार किया। दोबारा राष्ट्रपति बन गये तो अपने ट्रंप जी ने तो चाल ही बदल दी। भारत में अमेरिकी उत्पादनों पर लगने वाली टैरिफ की आलोचना कर वह भारतीय उत्पादनों पर भी टैरिफ लगाने में जुट गये। बेचारे करें भी तो क्या करें। खुद को बड़ी मुश्किल से यही कहकर चुनाव जीतकर आये हैं कि अमेरिका को श्रेष्ठ बनाना है।

गनीमत है कि हर अमेरिकी नागरिक के बैंक खाता में पंद्रह लाख डॉलर देने का वादा नहीं किया था उन्होंने। अब तो बार बार यह धमकी भी दे रहे हैं कि ब्रिक्स के सदस्य देशों में अतिरिक्त टैरिफ लगायेंगे क्योंकि बिक्र्स शिखऱ सम्मेलन में डॉलर का विकल्प तलाशने पर चर्चा हो गयी है। खुद ट्रंप भी जानते हैं कि अगर ऐसा हुआ तो उनकी दादागिरी खत्म होने लगेगी।

खैर छोड़िये अब पड़ोसी पाकिस्तान को ले लीजिए। वहां भी मोदी जी बिना निमंत्रण के चले गये थे। अच्छी तरह स्वागत भी हुआ और लगा कि शायद भारतीय प्रधानमंत्री ने स्थायी शांति स्थापित करने की दिशा में एक बेहतर कूटनीतिक कदम उठाया है। इसके बीच चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग आये तो उन्हें भी सावरमती आश्रम में झूले पर बैठाया।

लगा कि मामला बेहतरी की दिशा में जाएगा। नतीजा क्या हुआ। पहले गलवान घाटी की घटना हुई। उसके बाद चीन की सेना भारतीय सीमा के अंदर प्रवेश कर गयी। यह तो भारतीय तोपखाना का कमाल था कि उस ऊंचाई पर भारतीय तोप को देखकर चीन की सेना को पीछे हटना पड़ा।

दूसरी तरफ पहलगाम में आतंकी हमला हो गया तो ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह साबित हो गया कि चीन ने लगातार पाकिस्तान की मदद की है। पूर्व में अब बांग्लादेश भी भारत को दूसरे तरीके से धमकाने लगा है। कुल मिलाकर मोदी जी की मित्रता वाली कूटनीति लगातार फेल हो रही है।

फिल्म आखिर क्यों के इस गीत को लिखा था इंदीवर ने और संगीत में ढाला था राजेश रोशन ने। इस गीत को अमित कुमार और लता मंगेशकर  ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल इस तरह हैं।

दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है 2

उम्र भर का ग़म हमें ईनाम दिया है

दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है

उम्र भर का ग़म हमें ईनाम दिया है

तूफ़ाँ में हमको छोड़ के साहिल पे आ गये

तूफ़ाँ में हमको छोड़ के साहिल पे आ गये

साहिल पे आ गये

नाख़ुदा का

नाख़ुदा का हमने जिन्हें नाम दिया है

उम्र भर का ग़म हमें ईनाम दिया है

दुश्मन न करे ओऽ

पहले तो होश छीन लिये ज़ुल्म-ओ-सितम से

पहले तो होश छीन लिये ज़ुल्म-ओ-सितम से

ज़ुल्म-ओ-सितम से

दीवानगी का

दीवानगी का फिर हमें इल्ज़ाम दिया है

उम्र भर का ग़म हमें ईनाम दिया है

दुश्मन न करे ओऽ

अपने ही गिराते हैं नशेमन पे बिजलियाँ

अपने ही गिराते हैं नशेमन पे बिजलियाँ

नशेमन पे बिजलियाँ

ग़ैरों ने आ के

ग़ैरों ने आ के फिर भी उसे थाम लिया है

उम्र भर का ग़म हमें ईनाम दिया है

दुश्मन न करे ओऽ

बन के रक़ीब बैठे हैं वो जो हबीब थे

बन के रक़ीब बैठे हैं वो जो हबीब थे

वो जो हबीब थे

यारों ने ख़ूब

यारों ने ख़ूब फ़र्ज़ को अंजाम दिया है

उम्र भर का ग़म हमें ईनाम दिया है

दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है

उम्र भर का ग़म हमें ईनाम दिया है

तो यही जमीनी हालत है और इसके बीच ही हम लगातार तरक्की करने का दावा ठोंक रहे हैं। बिहार में चुनाव करीब आया तो मतदाताओं की नये सिरे से पहचान करने का फरमान जारी हो गया। सवाल है कि इसकी जरूरत आखिर क्यों पड़ी। ममता बनर्जी पहले से ही इस कार्रवाई को परोक्ष रुप से एनआरसी लागू करने की साजिश बता रही है। सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग से जवाब मांगा है कि आखिर आधार कार्ड मान्य क्यों नहीं है। आम सवाल यह है कि अगर मतदान में भी आधार कार्ड मान्य नहीं है तो क्या यह कार्ड सिर्फ एक कागज का टुकड़ा है।

वइसे इस मौके पर संघ प्रमुख मोहन भागवत का रिटायर होने वाला बयान चर्चा में आ गया है। उन्होंने कहा है कि नेताओं को 75 साल की उम्र के बाद खुद ही रिटायर हो जाना चाहिए। अब सारे लोग इस बयान को नरेंद्र मोदी से जोड़कर ही देख रहे हैं। पता नहीं सितंबर के बाद आखिर क्या होगा।