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दिल्ली पुलिस की सख्ती और समर्थकों की भीड़ के पीछे चिंता

अभी तो काम चला पर आगे क्या होगा

पुलिस लेकर जनता से नहीं मिल सकते

बच्चे भी सीधे जनता से जुड़े हुए हैं

एक अफसर की पीछे क्यों खड़े हो

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः भारतीय जनता पार्टी के भीतर आंतरिक रूप से चिंताएं दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं, जो अब पार्टी के रणनीतिकारों और जमीन से जुड़े नेताओं के लिए एक बड़ा सिरदर्द साबित हो रही हैं। देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में सीजेपी और विभिन्न विपक्षी दलों द्वारा लगातार किए जा रहे आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों के बीच आम जनता के मूड को भांपना अब किसी के लिए भी कठिन काम नहीं रह गया है। यही कारण है कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले भाजपा नेता अब अपनी ही पार्टी की रणनीतियों और प्रशासनिक फैसलों को लेकर और अधिक असहज और परेशान महसूस करने लगे हैं।

इस राजनीतिक असंतोष की बानगी हाल ही में राजधानी दिल्ली में देखने को मिली, जब पुलिस के कड़े सुरक्षा घेरे के पीछे खड़े भाजपा कार्यकर्ताओं और कुछ कथित हिंदूवादी संगठनों के लोगों द्वारा सीजेपी के सदस्यों के साथ-साथ कवरेज कर रहे पत्रकारों के साथ अभद्र व आक्रामक व्यवहार किया गया। इस तरह की घटनाओं ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के माथे पर चिंता की लकीरें और गहरी कर दी हैं। दूसरी तरफ, राजनीतिक विश्लेषकों और समझदार तबके का यह भी मानना है कि देश की शीर्ष ब्यूरोक्रेसी यानी प्रशासनिक महकमे के भीतर भी कहीं न कहीं भीतरखाने असंतोष व्याप्त है। अधिकारियों के स्तर पर उपजे इस असंतोष और नाराजगी का सीधा फायदा विपक्ष को मिल रहा है, जिसे वह सरकार पर लगातार तीखे हमले करने के लिए एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है।

नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने बहुत साफ शब्दों में यह स्वीकार किया कि यदि राजनीति करनी है और जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत रखनी है, तो हमेशा पुलिस के संरक्षण और बैरिकेड्स के सहारे काम नहीं चलाया जा सकता। जनता के बीच जमीन पर जो अलोकप्रियता बढ़ रही है, उसका खामियाजा अंततः पार्टी को ही भुगतना पड़ेगा। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान यह बात भी खुलकर सामने आ गई है कि ज्ञानेश कुमार जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों या चेहरों को लेकर खुद भाजपा के भीतर अब एक राय नहीं बची है। केवल एक अफसर विशेष के पीछे अपनी पूरी सरकार की राजनीतिक प्रतिष्ठा को दांव पर लगाने की जो प्रवृत्ति देखी जा रही है, उससे पार्टी की छवि को भारी नुकसान पहुंच रहा है। स्थिति यह है कि इस मनमाने रवैये से पारंपरिक और कट्टर भाजपा समर्थक तक अब भीतर से नाराज और आहत महसूस कर रहे हैं।