भारतीय लोकतंत्र के महाकुंभ में डुबकी लगाने के बाद अब सारा देश उस क्लाइमेक्स की ओर बढ़ रहा है, जहाँ स्क्रीन पर नीली-लाल पट्टियाँ चलेंगी और किसी का पावर ऑन होगा तो किसी का ऑफ। सबसे पहले बात दिल्ली की, जहाँ नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी रात बाकी के सुर गुनगुना रही है।
यहाँ चिंता हारने की नहीं, बल्कि जीत के मार्जिन की है। मोदी जी सोच रहे होंगे कि अगर 400 पार का आंकड़ा 399 रह गया, तो विपक्ष इसे नैतिक हार का तमगा पहना देगा। वहीं, अमित शाह के माथे पर चाणक्य वाली चिंता है— अगर आंकड़े इधर-उधर हुए, तो वो कौन-कौन से घोड़े हैं जिन्हें अस्तबल में वापस लाने के लिए रिसॉर्ट बुकिंग करनी पड़ेगी?
जीतने पर मोदी जी इसे दैवीय शक्ति का आशीर्वाद बताएंगे और अमित शाह अगले 50 सालों के लिए विपक्ष के शटर गिराने की योजना बनाएंगे। हारने पर (जो फिलहाल उनके शब्दकोश में नहीं है) हार को तपस्या में कमी बताकर बनारस के किसी घाट पर मौन व्रत की तैयारी होगी, और शाह साहब अगले चुनाव की रणनीति उसी शाम चाय के साथ शुरू कर देंगे।
उधर कोलकाता में ममता बनर्जी की हवाई चप्पलें कालीघाट के गलियारे में कुछ ज्यादा ही शोर कर रही हैं। दीदी की चिंता यह नहीं है कि वो सत्ता में रहेंगी या नहीं, बल्कि चिंता यह है कि कहीं राम के नाम पर वाम और श्याम (बीजेपी) मिलकर उनके किले की ईंटें न खिसका दें। जीतने पर दीदी एक पैर पर खड़ी होकर खेला होबे का अगला वर्जन लॉन्च करेंगी और दिल्ली फतह का एलान करेंगी। हारने पर यह सब ईवीएम की साजिश है, केंद्र की तानाशाही है, कहकर वो धरने पर बैठ जाएंगी और केंद्र को कागज नहीं दिखाएंगे की धमकी देंगी।
इसी बात पर सुपरहिट फिल्म नमक हलाल का एक गीत याद आ रहा है। इस गीत को लिखा था अंजान ने और संगीत में ढाला था बप्पी लाहिड़ी ने। इसे आशा भोंसले और बप्पी लाहिड़ी ने अपना स्वर दिया था।
रात बाकी, बात बाकी होना है जो, हो जाने दो रात बाकी,
बात बाकी होना है जो, हो जाने दो
तन्हाई में, परछाईं में अपना कोई, खो जाने दो रात बाकी,
बात बाकी होना है जो, हो जाने दो
आगाज़ ये है, तो अंजाम क्या होगा मईकश जो हम हैं,
तो बदनाम क्या होगा आगाज़ ये है,
तो अंजाम क्या होगा मईकश जो हम हैं,
तो बदनाम क्या होगा
पल दो पल के, हम मेहमान महफ़िल में,
खो जाने दो रात बाकी, बात बाकी होना है जो, हो जाने दो
किसके मुकद्दर में, क्या लिखा है किसने जाना है,
किसने देखा है किसके मुकद्दर में, क्या लिखा है
किसने जाना है, किसने देखा है
जो होना है, वही होगा दुनिया को, हो जाने दो रात बाकी,
बात बाकी होना है जो, हो जाने दो
तन्हाई में, परछाईं में अपना कोई, खो जाने दो रात बाकी, बात बाकी होना है जो, हो जाने दो…
तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन की रात कुछ अलग तरह की बेचैनी में बीत रही है। उन्हें डर है कि कहीं अन्नामलाई की लहर उनकी द्रविड़ राजनीति की जड़ों में कमल न खिला दे। उनकी चिंता भाषा और संस्कृति के उस मोर्चे को लेकर है, जिसे वो अपनी जागीर समझते रहे हैं। वहीं केरल में पिनरई विजयन की नींद लाल सलाम के बीच थोड़ी गुलाबी हो रही है। उन्हें चिंता है कि द केरला स्टोरी का नैरेटिव कहीं उनकी एंटी-इनकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) के साथ मिलकर उनके लाल किले में सेंध न लगा दे। केरल में अगर बीजेपी ने खाता खोल लिया, तो विजयन साहब को अपनी लुंगी की गांठ थोड़ी और कसनी पड़ेगी।
सबसे नीचे और सबसे ऊर्जावान हिमंता बिस्वा सरमा हैं। उनकी चिंता सबसे अलग है। वो यह नहीं सोच रहे कि जीतेंगे या नहीं (उन्हें यकीन है वो जीत रहे हैं), उनकी चिंता यह है कि जीत के बाद कांग्रेस का कौन-सा नेता किस फ्लाइट से और कितनी जल्दी उनके पाले में आएगा।
4 मई की सुबह जब ईवीएम की सील टूटेगी, तो लोकतंत्र का असली चेहरा सामने होगा। जीतने वाले के लिए: जीत का मतलब होगा अहंकार की नई ऊंचाई। जीतने वाला सोचेगा कि जनता ने उसे भगवान मान लिया है और अब वो जो चाहेगा वही कानून होगा। जश्न की आतिशबाजी में हारने वाले की आवाजें दब जाएंगी। हार का मतलब होगा इस्तीफों का दौर और ईवीएम पर ठीकरा। हारने वाला नेता दिल्ली के लुटियंस जोन से लेकर रांची की गलियों तक पुनर्निमाण की बातें करेगा, लेकिन असल में वो अगले पांच साल के लिए पॉलिटिकल कोमा में जाने की तैयारी कर रहा होगा।